• Chapter 10   Nayi Subah

  • भाग्य देखो वीणा का!

    रिश्ते कितने आए थे कहीं न कहीं दोष निकाल देती थी| सपनों के जिस राजकुमार की कल्पना करती आई थी वह यौवन की दहलीज पर पहुँच कर भी कहीं दूर भी नहीं दिखाई देता था|

    मूल रुप से वे हिमाचल प्रदेश के थे| वहीं से रिश्ते आते थे| पन्नालाल-निर्मला से मिलकर अपनी सबसे बड़ी आकांक्षा को साकार किया था, अपने सब बच्चो को अच्छी शिक्षा दिलवाई थी| और इसी के परिणाम स्वरुप उनकी जानकारी में जो भी लड़का अच्छा पढ-लिख जाता था, उसका रिश्ता एक बार चलकर जरुरआता था| कोई माँग नहीं रखता था, बस सुशिक्षित-संस्कारी लड़की की कामना करता था| और ऐसे में जो-जो बहन बड़ी होती जा रही थी, उसका रिश्ता स्वयं चलकर आ रहा था| सुनीता की शादी ऐसे ही हुई| रजनी का रिश्ता भी ऐसे ही हुआ था|

    वीणा नहीं मानती थी ऐसे में, तो माँ-बाप यही समझते कि अभी उसका लगन ढ़ीला है| जब संयोग होंगे तो चट-पट सब कुछ हो जाएगा|

    आज देखो! संयोग जगे तो रिश्ता भी हो गया, शादी भी हो गई| और शादी के बाद सामने गरजते काले बादलों का अम्बार लग गया है| जोर-जोर से बादल गरज रहे हैं| बिजली कड़क रही है| न जाने कब बारिस हो जाए! बारिस कितनी होगी, तूफान आएगा, कैसी बरबादी लाएगा, अभी कुछ नही पता! अभी तो वीणा को याद आ रहे है वे चहरे जो कितनी आस लगाए उससे शादी को बेताब थे|

    एक था रतनलाल! डाक्टर रतनलाल| हिमाचल में कुल्लू क्षेञ का रहनेवाला| सुशिक्षित परिवार का लड़का| डाक्टरी की पढ़ाई के बाद वहीं सरकारी अस्पताल में नौकरी लग गई थी उसकी| उसके रिश्ते की बात शुरु हुई तो किसी ने बतायावीणा का| अपनी माँ के साथ वह चलकर देहरादून आया|

    वीणा को देखकर वह मोहित हो गया| और उधर पन्नालालने निर्मला से विचार-विर्मश किया| सरसरी तौर पर वीणा से पूछा और अभी वह कुछ सोचती या कहती, कह दिया - "अरे, इससे अच्छा और क्या मिलेगा! मेरी बेटी का भाग्य बहुत अच्छा है!" और 'ठीक है न, बेटी' - कहकर बिना उसे टटोले भीतर जाकर 'हाँ' कर दी| रतनलाल की माँ ने निर्मला को मुहँ मिठा करवाने को कह दिया| चन्द मिनटों में रतनलाल घर का जमाई घोषित कर दिया गया| ऐसे में चुहलबाजी करते हुए वीणा को रजनी ने मजाक में कह दिया, कैसा बौना लगता है, वीणा, गोल-मटोल! चलता है तो लगता है लुढ़क रहा है|'

    और तब वीणा ने गौर से देखा रतनलाल को| अरे ये क्या! डाक्टर के रुप में वह नहीं दिखा उसे| उसके मस्तिष्क ने, अब मन में बसे दर्पण ने उसकी तस्वीर खींची और अपनी काल्पनिक तस्वीर से उसका मेल किया| यह तो मन-दर्पण में रची-बसी छवि से बिल्कुल विपरीत थी!

    'अब क्या करुँ? कैसे मना करुँ?' - रजनी से कहा| रजनी ने माँ से बात की और माँ ने पन्नालाल से| 'अब मना कैसे कर सकते है? जुबान कर दी है| मुँह भी मिठा करवा दिया है| मना करेंगे तो सारी बिरादरी थू-थू करेगी| आगे कौन रिश्ता करेगा!' ढेर-सी शंकाएँ उमड़ आईं पन्नालाल के मन में| लेकिन बेटी के मन को भी नहीं तोड़ना चाहते थे| जोर-जबरदस्ती कभी नही की थी उन्होंने अपने बच्चों पर| ऐसे में बस एकांत में बैठ कर उन्होंने बहुत सोचा, फिर एक छोटी सी चिट्ठी रतनलाल की माँ के नाम डाक मेंडाल आए| अपनी लड़की की इच्छा के विरुद्ध वह नहीं जा सकते, यही भर लिख दिया|

    छोटा-सा प्रदेश है हिमाचल! पलभर में खबर सारी रिश्तेदारी में फैल गई| सभी नाराज हो गए| वीणा की नानी रुठ गई अपनी बेटी से, मामा भी उसके रुठ गए| लेकिन पन्नालाल ने जो निर्णय सुना दिया था, वह उससे नहींबदले|

    वीणा को कभी लगता कि उसने 'न' करके शायद गलती की है| रिश्तेदारों की बातें सुनी| लेकिन मन में बनी हुई छवि की ही जीत हुई, उसी ने दिलासा दिया, 'अगर वीणा तुम्हारी बात अनुचित होती तो वे तुमको जरुर कहते| प्यार से भी, गुस्से से भी। रिश्तेदारों की नहीं मान रहे हैं| - 'यदि मैं वास्तव में कोई भूल कर रही होती तो क्या ये मेरा साथ देते?'

    वक्त निकलता गया| हिमाचल सेअब उसके लिए रिश्ता आना मुमकिन ना था| ऐसे में अखबार में से विग्यापन छांटने शुरु हुए और वीणा स्वयं ही तलाशने लगी अपना वर|

    देव का मिलना उसके भाग्यमें था|

    यह मिलन सात जन्मों के रिश्ते से जुड़ा है या फिर यह सात जन्मों के बाद की नई दास्तान है| मन-दर्पण में बसी छवी तो मिल गई, लेकिन उस छवि के पीछे परदे में कितनी कहानियाँ हैं? कितनी सच्चाईयाँ हैं? कितने गहरे राज छिपे हैं? - एकाएकमन जब डर जाता है तो अनगिनत अग्यात आशंकाएँ उसे घेर लेती है| ढ़ेर-सी कल्पनाएँ उसने कर डाली पलभर की मुलाकात के बाद - वीणा की दशा तो उससे भी खराब थी| उसे समझ नही आ रहा था कि वह क्या करे?

    देव ने उसे धोखा दिया है|

    उसके घर वालों ने इतनी बड़ी बात छिपाकर शादी की है उसकी|

    - 'कौन दोषी है? कौन?'

    - 'घर वाले दोषी है - रमेश दोषी है तो देव भी तो दोषी है|'

    - 'मुझे घर वालों से क्या लेना - देव से शादी की है| दोष तो उसका ही है मेरे प्रति|'

    - 'ऐसे दोखेबाज के साथ जिन्दगी कैसे बीतेगी?'

    - 'जीवन भर......|'

    - 'कैंसर के मरीज से ब्याही दुल्हन का सुहाग कब तक बना रहेगा? कब तक? वह तो कह रहा है उसकी बीमारी जड़ से चली गई क्योंकि उसके शरीर का वह भाग ही काट कर फेंक दिया गया है जो खराब हो गया था|'

    - 'ऐसे व्यकित के साथ फिर भी कैसे गुजारा होगा?'

    - 'उसे छोड़ दूँ, दो टूक कह दूँ तुमने मुझे धोखा दिया है - धोखे से की गई शादी, शादी नही कहला सकती|'

    - 'छोड़कर सब कुछ सुबह ही देहरादून चली जाउँ और इसे एक भूली कहानी समझ लूँ?'

    - 'लेकिन....?'

    - 'लेकिन मम्मी-डैडी, छोटी बहनें-भाई, नाते-रिश्तेदारों को क्या बताउँगी?'

    - 'मम्मी-डैडी की क्या दशा होगी?'

    ढ़ेर-से प्रश्न उठ रहे थे उसके मन में| स्वयं को दुविधा में पा रही थी| कुछ और नही सोच सकी वह सामने बूढे माँ-बाप खड़े दिखाई दिए| कितनी खुशी से उन्होंने विदा किया था उसे! उनके सब सपने एकाएक तोड़ कर क्या वह खुश रह पाएगी?

    और तभी बिजली की तरह मन में एक निर्णय कौंध गया वीणा के.

    - 'घर जाकर भी रहूगी जैसे, यहीं इसी के साथ रह लूँ| जैसा भी है, पसन्द से वरण किया है उसका| जो होना है उसे ही होने दूँ| भाग्य की बात थी तभी इससे विवाह हुआ है| अब अपनी जिन्दगी भाग्य के सहारे ही छोड़ दूँ| जो बनाएगा-बिगाडेगा वह भाग्य ही करेगा| बस.... और कुछ नहीं! सुबह वीणा की आँख जल्दीखुल गई| देव तब सो रहा था| वह चुपचाप उठकर खिड़की के पास बैठ गई| सामने की सड़क पर इक्का-दुक्का लोग आ जा रहे थे| - सुबह की सैर को निकले हुए लोग| उसका भी मन हुआ कि वह उठे और तैयार होकर घर से बाहर निकल जाए| सुबह की हवा से उसका मन भी ताजा हो जाएग| लेकिन संकोच उसके आड़े आ गया| वह वहीं बैठी रह गई| खुली खिड़की से ताजी हवा आ रही थी| उसी का आनन्द लेने लगी| लेकिन वह ठंडी हवा उसको आत्मविभोर न कर सकी| मन ढ़ेर-सी आशंकाओ से सहम-सा गया था| कुछ सोचने समझने की शक्ति भी नही रही थी उसमें| बस रह-रह करसो रहे पति को देखलेती थी|

    - कितना सुन्दर था वह!

    - हाँ, देव बहुत सुन्दर था|

    लेकिन उसके भीतर की कहानी ने वीणा को कंपा दिया था| रोम-रोम सिहर उठा उसका| उसकी सुन्दरता पर मोहित हो गई थी वह| वह ग्यानी भी था, उसके मन पर भी वह मोहित हो गई थी| लेकिन इस व्यक्ति के लिए संजोए सपने वह टूटते नही देख पाने की क्षमता रखती थी, इसका भी एह्सास उसे था| जो कुछ भी बताया था देव ने अपने विषय में वह उसके विपरीत कुछ नहीं सोच पा रही थी| उसे देव का सब बताया सहज विश्वास करने योग्य नहीं लग रहा था, क्योंकि देव भला-चंगा तन्दुरुस्त उसके सामने सोया पड़ा था|

    देव को देखकर कोई कल्पना भी नही कर सकता था कि वह कभी अपने जीवन में एक महायुध्द लड़ चुका है| और फिर सबसे बड़ा ढाढ़स तो उसे उसका मन बधा रहा था कि देव आज तन्दुरुस्तहै| उसे भविष्य में कोई तकलीफ होगी तो वह उसके भाग्य में लिखी होगी| भाग्य को भला कौन बदल सकता है ? - यह धारणा उसके भीतर बैठे हुए संस्कारों के कारण भी जन्म ले रही थी| जो कुछ उसके साथ पहले से हो चुका है, वह शादी के बाद भी तो हो सकता था| तब वह क्या उसका साथ छोड़ सकती? वर्तमान में जल्दबाजी करना उचित नहीं| जल्दी में उठाया गया कदम गलत भी हो सकता है| देव के साथ परिणय-सूञ में बंधना उसकी नियति में लिखा था, उसी भाव में अब वह जीना सीखेगी|

    देव के चहरे को देखकर वह एकाएक संयमित हो गई| तभी वीणा के विचारों की क्ष्रंखला टूट गई| देव उठ चुका था| देव की ओर देखकर वीणा ने मुस्कुराने की चेष्टा की|

    "कब उठी....?" - देव ने धीमे से पूछा| शब्द सभी बिखरे हुए देख रहा था देव अपने| चाह कर भी वह उसकी ओर अपनी बाँहें नहीं बढ़ा पाया|

    "अभी, बस थोड़ी देर पहले" - नही बता सकी वह उसे कि नींद तो उसके पास नही फटकी| शरीर जो सौंपा था उसने रात देव को और जो कुछ भी महसूस किया, सुना, समझा और देखा वह सब उसके सभी सपनो को झकझोर गया| वह अपने सभी संजोए सपनो के साथ जिस आकाश में उड़ रही थी, वे सभी उसे बिखरते दिखे थे, उस पल-दो-पल की मदहोशी के बाद| वह जो देव को पाने कोबेताब थी, वह वीणा अब नही रही थी| अब चाहकर भी देव की ओर नहीं बढ़ पा रही थी|

    "क्या सोच रही हो...?" - देव ने दबे स्वर में पूछा| वह भी स्वयं को बेबस-पा रहा था, इससे अधिक कुछ नही कह पाया|

    "कुछ नहीं.... बस.... यूँ ही बिखरे शब्द-चुन रही हूँ| न कोई वाक्य बन रहा है, न कुछ....|" - बात अधूरी ही रह गई| आँसू न रोक पाई वह| सिसकने लगी देव को इस बात का एहसास तो था कि वह अभी ऐसा कुछ करने योग्य नहीं है कि जिससे वीणा रात के पहले चन्द क्षणो में उसे जैसी लग रही थी, सरलता से वैसी दिखने लगेगी| समझदार तो था, लेकिन उसके मन की थाह नहीं ले पारहा था| फिर बोला, "मैं अभी नहाकर सबसे पहले रमेश भाई से बात करुँगा.... उन्होंने ऐसा कैसे कर दिया ?"

    "उससे क्या होगा ? इस बत को अभी तूल मत दीजिए| मैं अभी अनिश्चितता के दौर से गुजर रही हुँ| जल्दबाजी में मैं कुछ ऐसा नहीं करना चाहती कि जिससे मेरे परिवार वालों को दुःख पहुँचे| मुझे अपनी भावनाओ के प्रवाह को रोकना है| जो हो चुका है, उसे एकाएक मैं बदलना नहीं चाह रही|" - वीणा का निश्चय अभी स्वयं उसे ही समझ नहीं आ रहा था, तब वह देव को क्या बताती|

    लेकिन उसके शब्दों ने जैसे देव को ताकत दी| उसे लगा, उसे वीणा के मनोभावो को जीतना होगा| उसे भावनाओ के प्रवाह में उलटी ओर जाने से रोकना होगा| एक ही शब्द सुनकर वह समझ गया कि वीणा भावुक लड़की है| नर्म दिल की है| उसे भावनाओ में बाँध कर रखा जा सकता है| वह उसके साथ बनी रहेगी यदि वह उसकी भावनाओ का सम्बल बन कर रह सका तो|

    भावुक प्राणी बह जाता है, भावनाओ में बहुत जल्दी| देव को लगा अब रास्ता उसे ढूँढ़ना है| ब्याहता है वह उसकी| उसे अपनी प्रेमिल भावनाओ में बाँध कर रखने की वह यथायोग्य चेष्टा करेगा| उसी प्रवाह में वह बोला - "मैं तुम्हारा गुनाहगार हूँ, वीणा! जो चाहती हो, जैसा चाहती हो, वही होगा आज से| बस एक बार मुझसे कह देना| मैं उफ तक नही करुँगा| मैंने जाने-अनजाने तुम्हारा दिल दुःखाया है| जो सजा दोगी मैं चुपचाप सह लूँगा|"

    देवकी बात वीणा के मन में आ बसी| भावुक लड़की थी वह, बोली - "जैसा सोचा था मैंने, वैसा तुम्हारा रुप पाया| स्वयं ही मैंने तुम्हारा वरण किया| जो नहीं जानती थी, या मैं जिससे अन्जान थी, वह मेरे साथ धोखे में हुआ या मेरे भाग्य से| अभी कुछ नही कह सकती| बस इतनी इच्छा है मेरी कि मैं कुछ ऐसा न कर बैठूँ जिससे मेरे परिवार के किसी भी सदस्य को ठेस पहुँचे| इसलिए अभी मेरी विनती है कि आज जो कुछ मेरे-तुम्हारे बीच हुआ है, उसकी परछाई भी इस कमरे के बाहर ना पहुँचे| यही वायदा चाहिए मुझको|" - वीणा के शब्द आँसुओं की अविरल धारा के साथ निकल रहे थे|

    'भावुक ही नहीं समझदार भी है!' - देवने सोचा मन में| पलभर में मन अपने सामने अनुरुप बनती परिस्थितिके साथ कितनी शीघ्रता से संयमित हो जाता है, यह इस समय देव की मनःस्थिति को देखकर समझा जा सकता था|

    "मेरे मन में तुम्हारे प्रति प्रेम ही नहीं आदर भी आ गया है जीवन में अभी तो सहे सब कष्ट जैसे मिट गए हैं| मुझे तुमसेकुछ नहीं चाहिए| बस मैं तुम्हारे लिए हरदम तैयार हूँ| जो चाहोगी, जैसा चाहोगी, वैसा ही होगा| - मुझे तुम्हारे निर्णय की प्रतीक्षा रहेगी| जो हुआ है यदि वह भाग्य में लिखा था तो जो होगा वह भी भाग्य के अनुरुप ही होगा|" - देव वीणा को छू न सका| हाँ, घुटने टेक कर उसके सामनेबैठ गया| और वीणा भी बस उस के कन्धो को छू कर बोली - "चलिए, अब तैयार हो जाते हैं| बाहर से कोई आवाज लगा देगा|"

    रात लगा था, बहुत बड़ा तूफान आएगा| लेकिन यह तूफान आया भी, जोर-जोर की गर्जना करता रहा और फिर एकाएक थम गया| कुछ तहस-नहस नहीं हुआ| हाँ वीणा की भावनाओ की खबर जरुर देव ने मन के हर कोने में बिठा ली| वह वीणा के मन को जीतने के लिए बेताब हो उठा था|

    और वीणा ने स्वयं को हालात के सहारे छोड़ दिया| वह एक नए परिवेश के लिए स्वयं को तैयार करना चाहती थी| अपने इस विवाहित जीवन का हर निर्णय वह अपनी सोच-समझ के अनुरुप लेना चाहती थी| वह अपनी खुशियाँ बाटने वाली वीणा थी, अपने आँसू स्वयं पीना चाहती थी|