• Chapter 12   Nayi Subah

  • वीणा के अच्छे स्वभाव से सास-ससुर व देवर भी बहुत प्रभावित थे| देव के पिता श्रीराम का स्वभाव वैसे भी घर में सबसे अच्छा था| सबका भला चाहने वाला श्रीराम सुबह से शाम तक घर में होते हुए भी अनुपस्थित-सा रहता था| न बेटों के काम में दखलंदाजी करना और न ही घर में किसी काम में| बस, सुबह शाम पूजा के अतिरिक्त दिन भर अपने पास-पड़ोस, पीछे दुकानदारों का हाल-चाल और अपने रिश्तेदारों के सुख-दुख की नियमित रुप से खबर लेतेरहना श्रीराम की दिनचर्या थी|

    क्रष्णा थोड़ी स्वभाव की चिड़चिड़ी थी| लेकिन वीणा के अच्छे स्वभाव के कारण और घर में देव और अमित के दबदबे के कारण वह वीणासेमधुर सम्बन्ध बनाए हुए थी| लेकिन उसके मन में इस बात की जरा भी कोई शंका नही थी कि उसका पुञ वीणा के मामले में कहीं कम है| वह अपनी बातों से यही महसूस करवाती थी वीणा को कि देव शुरु से शादी की तड़क-भड़क के खिलाफ था और रिश्तों के लिए भी कोई कमी नही थी| बस, वह शादीतभी करना चाहता था जब तक कि अपने पैरों पर खड़ा न हो जाए|

    रिसर्च के बाद दो साल तक कोई नौकरी नहीं लगी थी उसकी| स्कालरशिप के सहारे वह अपनी शादी का ख्याल नही ला सकता था| दूसरे उसके भाग्य में तकलीफ लिखी थी| बीमारी से पीछा छूटा तभी वह शादी के लिए माना| क्रष्णा की जिन्दगी अपनेघर की चारदीवारी में ही कटी थी| उसे नही मालूम था कि दुनियाँ कहाँ से कहाँ पहुँच गई है| उसके बच्चे उसकी आँखों के सामने भले-चंगे खड़े है तो वह समझती थी सारी दुनियाँ भली है| उसके बच्चों को कोई दुःख है तो उसको लगता था सारी दुनियाँ में दुःखो कापहाड़ टूट पड़ा है|

    वीणा अपनी सास के ग्यान की सीमा को समझती थी तभी उसे उसकी किसी बात का दुःख नही होता था| आखिर वह अपने बेटे की शुभचिन्तक थी और वीणा को देव काहर शुभचिन्तक अपना लगने लगा था| क्योंकि देव उसका सुहाग था| अपने सुहाग की मंगलकामना ही उसका प्रथम कर्तव्य बना हुआ था|

    शादी से पहले उसने स्कूल से दो महीने की छुट्टी ले ली थी| सारी योजना उसने सोच समझ कर बनाई थी| दो महीने बीतते ही गर्मी की दो महीने की छुट्टियाँ हो जाती थी| कुल मिलाकर चार महीने उसे देव के साथ मिल रहे थे| एक-दूसरे को समझने के किए इतना समय काफी होता है| उसे विश्वास भी था कि इस बीच वह केन्द्रिय विद्यालय संगठन से अपनी दिल्ली में बदली करवा लेगी| ऐसा ही किया देव ने| उसकी बदली के लिए भी दौड़-धूप शुरु कर दी थी|

    उधर वीणा की सास को एक ही बात आजकल करने को रहती थी| जब भी वीणा उसके पास बैठती, यही सुनने को मिलता उसे, "हमारे समय में तो पहला बच्चा शादी के एक साल के भीतर हो जाता था| देखो, मेरी मानो तुम भी यही करना| कोई गोली खाने के चक्कर में न पड जाना। जल्दी से मुझे दादी बना दो। तुम अपने स्कूल आराम से जाती रहना, बच्चे को मैं संभाल लूँगी|"

    यह सुनकर वीणा मुस्कुरा भर देती| कैसे बताती अपनी सास को कि अभी तो किसी अप्राक्रतिक साधन की उसे जरुरत ही नहीं पडीहै| अभी तो शरीर का सम्पर्क केवल सहलाने भर का है और वह भी उसी में ही अपना मन लगाए है| वक्त आएगा, सब ठीक हो जाएगा| जरुरत है अभी देव को तनावमुक्त रहने की|

    देव तनाव में रहता था अक्सर शाम बीत जाने के बाद| एकाएक उसे लगने लगता था कि जैसे रात आते ही उसे वीणा के सामने परीक्षा देनी होगी| और वह उस परीक्षा में स्वयं को समय आने से पहले ही असफल पाता| हाँ, किताबें पड़नी शुरु की थी उसने| ढ़ेर सी किताबें पड़कर उन पर अमल करने की कोशिश भी की थी| वीणा ने सदैव उसका साथ भी दिया| लेकिन देव अपना संयम समय से पहले ही खो देता था| इन किताबो के सहारे ही वह जान पाया और सदा कोशिश भी करता था कि वीणा को वह अपने स्पर्श से कुछ राहत दे सके| और वीणा, वह इसी स्पर्श की दिवानी बनी देव के लिए घन्टों प्रार्थना करती थी. उसने अपना ध्यान शारीरिक सम्पर्क से हठा रखा था| जो मिल जाता था उसी में ही संतुष्ट रहने वाली थी वह| और ऐसे व्यक्ति को सुख की परिभाषा बहुत सरल लगती है|

    यही सुना था उसने अपने घर में पिता के मुख से कि - सुख साधन है, सुख आराधना है, सुख मोल लिया नही जाता, सुख वही रुप जो हम पहचानें| जो हो रहा है उसमें सुख खोजो। जो दुःख लगता है उसमें सुख खोजो! - यह गीता भाव उसके मन-प्राणों में बसा था और उसी भाव में वह जीना सीख रही थी|

    ऐसे ही वक्त बीतता जा रहा था|

    अमित के जीवन में बहार आ गई थी| देव की शादी के बाद उसे अपनी जिन्दगी में नई खुशियाँ दिखने लगी थी| वीणा भाभी का दिवाना था वह| निम्मी व मालती भाभी का साथ तो उसे बहुत कम मिला था| दोनों ही अपनी-अपनी ग्रहस्थी में इतनी व्यस्त थी कि साल में जब-जब भाई छुट्टी पर आते तभी चन्द दिनों का साथ उसे अपनी भाभियों का मिल पाता था| ऐसे में उससे जो बन पड़ता, वह उनकी तीमारदारी में लगा रहता| घर का छोटा सबसे इसी में खुश रहता था कि वे सब, जब भी आती, 'अमित ये लाओ, अमित वो लाओ|' 'अमित मेरे साथ बाजार चलो', कहकर उसे इतना महत्व देती है| जैसे उसके बिना हर किसी की दिनचर्या अधूरी रहती है!

    ऐसे में वीणा को भाभी के रुप में अपने आसपास देखकर बहुत प्रसन्न था| वैसे भी वीणा उसे अपनी दूसरी भाभियो से बिल्कुल अलग लगी| एक तो वह देव की पत्नी थी| देव जो उसके मन के बहुत निकट था| देव जो आज उसे खुश दिखता था| देव को उसने कष्ट सहते देखा था| बहुत करीब रहा वह उसके उन क्षणों में| देव की एक-एक कराहट उसे याद है| ऐसे में अपने भाई देव के चहरे पर वीणा के आ जाने से, जो खुशी उसे देखने को मिली, उसी ने उसे वीणा का दिवाना बना दिया|

    वीणा अच्छी है| बहुत अच्छी है| इससे अधिक वह भी वीणा के दिल को नही जान पाया| नही जान पाया कि उसका दिल तो देव की मंगलकामना में लगा रहता है| उसके मन की थाह लेना कठिन था| हमें जिस बात की खबर होती है, उसी की सोचते है. अपने मन की गहराईयो में सदैव वही बात घर करती है जो स्वयं से सम्बधित हो| अपना मन ठीक है. तो लगता है दूसरेका मन भी ठीक होगा| अमित को वीणा के चहरे पर सुख भाव ही दिखते थे और ऐसे में वह उसके भावो में अपने प्रति स्नेह भाव ही पाता था| वीणा को उससे बात करना अच्छा लगता है| वह वीणा से हरदम बात करने को तत्पर रहता था|

    सुबह काम पर जाने से पहले नित्य वह वीणा से एक ही प्रश्न पूछता था "भाभी! जा रहा हूँ, किसी चीज की जरुरत हो तो बताना| शाम को लेता आउँगा!" या फिर कि "भाभी! जा रहा हूँ| भाई को पूछ लेना नाईट-शो पिक्चर जाना हो तो टिकट लेता आउँगा!"

    ऐसे में वीणा मुस्कुरा कर यही कहती, "मैं तो पिक्चरजाने को हरदम तैयार रहती हूँ| अपने भाई से स्वयं पूछ लो| जाना चाहेंगे तो मुझे क्या एतराज होगा|"

    वीणा को देहरादून से माँ का पञ आया| शाम को लौटकर उसे यह खबर भी अपनी माँ से मिल जाती थी| यही पूछने की चाह होतीउसकी कि माँ ने प्रिया के बारे में कुछ लिखा है या नही! और प्रिया का पञ जब आता तो उसकी कोशिश रहती कि वह उसके लिखे शब्दों को पढ़ ले| कहीं शब्द अपना रुप बदल कर उसका नाम भी लिखा दिखा दें!

    प्रिया के लिखे एक-दो पञ उसने बहाने से पढ़े भी थे. यही कह कर कि "भाभी मुझे दिखाईए प्रिया का पञ| देखूँ, उसकी लिखाई को मैं| उसके भविष्य के बारे में बता दूँगा!"

    और वीणा हँसते हुए उसे पञ दिखा देती थी| मन ही मन समझने लगी थी कि अमित कही न कही किसी रुप में प्रिया को पसन्द करता है| वह उसके लिखे शब्दो में अपना रुप खोजता है| लेकिन प्रिया के पञो की इबारत में उसे ऐसा कुछ न दिखाई देता| कही भी अपना नाम न लिखा मिलता| कुछ अक्षरो को मिटाकर, कुछ अक्षर जोड़ कर भी अपना नाम नहीं बना दिखता था!

    वीणा को भी अमित के मनोभावों की खबर लगनी शुरु हो गई थी| प्रिया के प्रति उसकी उत्सुकता देखकर वह समझ रही थी अमित के मन में बस रही प्रिया की भावनाओ को| अमित सर्वगुण सम्पन्न लगा उसे| प्रिया के प्रति उचित वर| लेकिन ऐसा सोचकर वह परेशान भी हो जाती थी| देव से उसके विवाह से अब तक तो सब ठीक चल रहा था| लेकिन कही कुछ हो गया तो! लेकिन क्षणभर में उसके संस्कार उसे इससे अधिक सोचने को रोक देते थे| देव को अब कुछ नही हो सकता| देव अब बिल्कुल ठीक है| उसे अब कुछ नही होगा| और ऐसे में अमित का इस सब से क्या लेना| वह तो बिल्कुल ठीक है| उसकी अपनी भी तो जिन्दगी है! सबकी थाह लेने वाला अपनी पत्नी को कितना खुश रखेगा, इसकी कल्पना करते ही प्रिया का खिला चेहरा उसकी आँखों से उतर कर उसके दिल में समा जाता| प्रिया अमित को पाकर जीवन में बहुत खुश रहेगी| उसके लिए अमित ही अच्छा वर है| घर वालो के प्रति वह निश्चिन्त भी थी| उन्हें देव की पिछली जिन्दगी का नहीं पता| देव ठीक रहेगा, तो उन्हें कुछ पता भी नही लगेगा| और देव ठीक रहेगा अब, ऐसा उसका मन कहता है| ऐसी ही उसकी कामना है|

    अमित को वह देव से अलग करके देखने लगी| अमित के गुण उसे देव से भी उपर लगने लगे| पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने अपने दम पर अपना व्यापार शुरु किया था और वह दिन-रात मेहनत करके उपर ही उठ रहा था| दिन भर काम में व्यस्त रहता| शाम को अपने परिवार के लिए सुख-साधन जुटाने में व्यस्त रहता| शादी से पहले वीणा को व्यापार करने वालो की दिनचर्या का ज्यादा आभास न था| अमित की दिनचर्या देखकर उसे लगा कि नौकरी पेशा से अपना व्यापार करने वाले बीस ही होते है| उन्हें सब सुख-साधान जुटाने में कोई परेशानी नही होती|

    ऐसे में वीणा ने अपने हर पञ में सबकी कुशलता के विषय में लिखने के साथ-साथ अमित के बारे में, उसकी दिनचर्या के बारे में, उसके व्यक्तित्व की विशेषताओ के बारे में कुछ न कुछ लिखना शुरु कर दिया| माँ को तो वह लिखती ही थी प्रिया को भी थोड़ा-बहुत लिखने लगी|

    लेकिन प्रिया को अपनी दीदी के मन में अपने प्रति बसती जा रही चाहना की खबर नहीं लग पाई| वीणा के पञो की इबारत में अमित का नाम, अमित की प्रशंसा पढ़-पढ़कर वह अमित के विषय में सोचती जरुर थी, लेकिन ऐसा कभी भी उसके मन में विचार नही आया था कि उसकी दीदी अमित व उसका सम्बन्ध बनाने की सोच रही है| हाँ, वीणा दीदी के पञ पढ़कर छोटी बहन गीता जरुर उससे चुटकी लेते हुए कहती थी - "वीणा दीदी अपने हर पञ में अमित के विषय में ढ़ेर सारी बाते लिखती हैं| कहीं उसका मन तुम्हें अपनी देवरानी बनाने का तो नहीं?"

    ऐसे में प्रिया मुस्कुरा भर देती थी| लेकिन यह सिलसिला जबहर पञ में चलने लगा तो उसके मन में भी अमित की कल्पना से सुखद अनुभूति का अनुभव करना शुरु कर दिया| लेकिन मन की बात उसने अपने मन में ही रखी, किसी को इसकी खबर न हुई|

    ऐसे में कुछ दिन और बीते और प्रिया का जन्मदिन आ गया| अपने कालेज की सखियो को उसने शाम को चाय पर बुला रखा था| दोनो बहनें सुबह से ही सब तैयारी में जुटी थी| दोपहर की डाक से प्रिया के नाम हो शुभकामना सन्देश आए| एक कार्ड देव-वीणा का था और दूसरा अमित का|

    'अमित का कार्ड मेरे नाम!' - सुखद आश्चर्य हुआ उसे, यही सोचा उसने, 'जरुर वीणा दीदी ने बताया होगा उसे मेरे जन्मदिन का|' - और मुस्कुरा दी वह ऐसा सोचकर | गीता ने देखा तो माँ से कहने लगी - 'मम्मी! देखो, अमित ने भेजा है प्रिया को कार्ड!'

    'चलो, अच्छी बात है! वीणा ने बताया होगा उसे!'

    - आश्चर्य हुआ दोनो को माँ के मनोभाव जानकर| माँ को अमित अच्छा लगता था| यही बोली, "अच्छा लड़का है|"

    "अच्छा लड़का है, लेकिन प्रिया को कितना अच्छा लगता है, यह भी तो देखना होगा!" - गीता ने यह कहते हुए प्रिया को चुटकी काटी|

    "चल, पागल कहीं की! कार्ड को देखकर बात कहाँ की कहाँ ले गई!" - प्रिया ने उसे प्यार से झिडकते हुए कहाँ| लेकिन मन ही मन वह खुश हो रही थी| उसे समझ आ रहा था कुछ-कुछ पञो में अमित के विषय में बातें लिखने का वीणा दीदी का इरादा| देव-वीणा के कार्ड को ड्राईंग-रुम में सजा दिया और अमित के कार्ड को अपनी एक पुस्तक में रख लिया|

    लेकिन गीता उसे छेड़ती रही दिनभर| प्रिया थी कि उसकी बातें सुनकर मुस्कुराती रही, बोली कुछ नही मुख से| अमित के प्रति कोमल भाव पनपने लगे थे उसके मन में| बार-बार वह अमित के लिखे शब्दों को मन में गुनगुना रही थी|
    उधर अमित बहुत बेचैन था| 'आज प्रिया का जन्मदिन है, उसे कार्ड मिल गया होगा|' उसी के विषय में ही सोच रहा था| 'कैसा लगा होगा उसे कार्ड देखकर ?' - वीणा भाभी से छिपा के भेजा था उसने| जानता था, वीणा भाभी को मालूम पड़ जाएगा| क्या सोचेगी, कुछ सोचेगी, कैसा सोचेगी, इसी की कल्पना किए जा रहा था| शब्द भी ढूँढ़ रहा था मन में वीणा के किसी प्रश्न के उतर में| लेकिन शब्द थे कि वीणा के लिए उतर खोजने की उपेक्षा प्रिया के नाम की माला जपे जा रहे थे| तब उसने प्रिया के नाम एक कविता लिख डाली| आश्चर्य हुआ उसे! ये कैसे हो गया ? शब्द एकाएक कैसे कविता में ढल गए! ये कैसे शब्दों का रुप एकाएक निखर आया!

    "प्रिया|
    किसी के मनोभावों का बिम्ब
    किसी की आँखों का उल्लास
    किसी के ह्रदय का कण-कण
    अथाह उमंगों का दर्पण|
    - मूक मगर
    अधरों पर मुस्कान लिए
    चहरे पर उल्लास की आभा
    आँखों में एक प्रीति लिए|
    किसी से नेह का नाता जोड़े
    किसी से चिन्तन का है साथ
    किसी की आँखों की है ज्योति
    किसी की जीवन की प्रभात|
    प्रतिपल नवीनता के दर्शन
    नित नई उमगों से मिलन
    प्रिया! तुम मेरा जीवन,
    जीवन की उत्कट उमंग|

    बहुत अच्छा लगा उसे कविता लिखकर| बार-बार उसे पढ़ता. पढ़-पढ़ कर मन ही मन खुश होता| जी चाह रहा था उसका पंख लगा कर उड़ जाए प्रिया के पास और उसे सुना आए अपनी कविता| ऐसा नही कर सकता था वह, यह समझ कर उदास हो गया| बस अपनी डायरी में कविता लिखकर उसे ही पढ़ता रहा|

    अब रोज डायरी में अमित प्रिया के नाम कुछ न कुछ शब्द जोड़ने लगा| उसे सुखद आश्चर्य हुआ कि ये शब्द स्वयं एक कविता में ढल कर सामने आ जाते थे| जैसी उसके मन की स्थिति होती थी वही अपनी लेखनी से प्रिया के नाम लिख डालता था| ऐसा कर के उसे लगता जैसे प्रिया से वह बाते कर रहा है| जैसे प्रिया उसके सामने बैठी है| चाह होती कभी इतनी कि वीणा भाभी से कह डाले अपने दिल का हाल| ऐसे में एक दो बार उसने कोशिश भी की| लेकिन कह न पाया| फिर उसने अनजान बनते हुए अपनी डायरी को ऐसी जगह रखना शुरु कर दिया, जहाँ वीणा की नजर उस पर आसानी से जा सकती थी| लेकिन फिर भी वीणा को नही पता लगा| वीणा ने डायरी देखी जरुर, पर उठा कर देखने की कोशिश नही की| आदत नही थी उसकी किसी के निजी डायरी को देखने की|