• Chapter 16   Nayi Subah

  • माँ निर्मला की नींद बाहर रसोईघर में जली बती देखकर खुल गई| उसे एकाएक लगा की भोर हो गई है| उठकर कमरे से बाहर आ गई | दीवार पर टंगी घड़ी देखी तो पाया अभी रात के दो बज रहे है| रसोईघर में झांका तो देखा वीणा को| परेशान-सी खड़ी गैस पर पानी गरम कर रही थी|

    इतनी रात गए वीणा को पानी गरम करने की क्या सूझी ? वह रसोईघर में चली आई| वीणा ने माँ को देखा और चौंकते हुए बोली, "अरे, माँ आप कैसे उठ गई ?"

    "मेरी तो बर्तन की आवाज से नीदं खुल गई| लगा सुबह हो गई| तुम इतनी रात को यह पानी गरम क्यो कर रही हो?" - पूछा माँ ने| उतर के रुप में पाया वीणा की हड़बड़ाहट को| दबे स्वर में वीणा ने कहा, "देव को गर्म पानी की बोतल दे रही हूँ| उन्हें जरा-सा दर्द हो रहा है|"

    "दर्द! कैसा दर्द? क्या हुआ उन्हें?" - माँ थोड़ा घबरा गई| "कुछ नही माँ, कमर में दर्द हो रहा है| बस, आप सो जाओ| चिन्ता न करो| अभी ठीक हो जाएँगे|" - वीणा ने बात को इतना कह गैस बन्द कर दी| माँ ने आगे बढ़कर उसकी सहायता की रबड़ की बोतल में पानी डालने की|

    वीणा चाह रही थी, माँ उसके कमरे में न जाए| लेकिन रोकती कैसे वह तो उससे पहले ही कमरे में जा पहुँची| देव ने उन्हें नहीं देखा| वह औंधे मुँह पलंग पर लेटा हुआ था| हाथ उसका अपनी कमर से नीचे कुल्हे पर था| दर्द में तड़प रहा था वह| कुछ समझ न आया उन्हें| वहीं खड़ी रही कुछ पल| वीणा भीतर आयी तो इशारे से उसने माँ को बाहर जाने को कह दिया| माँ निर्मला को भी उसका इशारा उचित लगा| वह चुपचाप बाहर चली आई| नींद उसकी आँखो से दूर भाग गई थी| कान उसके देव के कमरे की ओर लगे थे| परेशानी बढ़ती जा रही थी| देव के कराहने की आवाज आ रही थी|

    "ये क्या हो गया है, देव जी को! न जाने क्यों दर्द हो रहा है|" - माँ निर्मला ने अपने पति को धीरे से हिलाते हुए कहा| पन्नालाल की आँख खुल गई| उठकर बैठते हुए बोले - "क्या हुआ? क्यों नीदं नही आ रही?"

    "न जाने क्या हुआ है, देव जी को बहुत दर्द हो रहा है| आवाज सुनी तो नींद खुल गई| इतनी रात को उनके कमरे में भी गई लेकिन वीणा ने बाहर जाने को कह दिया|" - निर्मला ने मन में आई शंका को बताया|

    "तबीयत खराब हो गई होगी| ज्यादा देर बैठने से दर्द हो जाता है| अब सोने की कोशिश करो| सुबह पूछ लेना|" - यह कहकर पन्नालाल तो दूसरी ओर मुँह करके फिर सो गए|

    लेकिन माँ निर्मला की आँखों से नींद दूर भाग गई थी| साथ के कमरे में उनकी बेटी जाग रही है| परेशान है| वह कैसे सो सकती है ? इसी उधेड़बुन में सवेरा हो गया| देखा उन्होंने वीणा फिर पानी का पतीला गर्म करके कमरे में ले जा रही है| इस बार बोतल में नही| पूरा पतीला कमरे में जाता देखकर वह फिर बेचैन हो गई| हो न हो देव की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है|

    हिम्मत जुटाई और धीमे से उठकर वीणा के कमरे के दरवाजे पर उन्होंने दस्तक दी| क्षण भर पश्चात् ही वीणा ने दरवाजा खोला| माँ को देखकर बोली, "अरे, आपको लगता है नींद नहीं आई ?"

    "तुम इतनी देर से जाग रही हो| देव जी परेशान हैं| ऐसे में मुझे नींद कैसे आती ?" - माँ ने अपनी परेशानी वीणा से कही - "अब दर्द कैसा है ?"

    "आराम है." - कहा वीणा ने - "अभी बाथरुम गए है|"

    "एक बात पूछूँ, वीणा! बाथरुम में पानी का गीजर लगा है| फिर भी तुम रसोई से पानी गर्म करके देती हो सुबह-सवेरे| ऐसी कैसी आदत है देव जी की ?" - माँ के चहरे पर कौतूहल था| यह जिग्यासा शान्त करना चाहती थी वह| पहले ऐसा देहरादून में भी उन्होंने देखा था| वहाँ तो गीजर नही लगा था, लेकिन यहाँ तो लगा है| फिर भी पानी रसोई से क्यों ? अभी और भी पूछना चाह रही थी, फिर बोली - "बाथरुम में भी एक घंटा लग जाता है| बहुत देर तक क्या करते है ?"

    अब क्या बताए माँ को| छोटी-सी बात और उस बात का खुलासा करना नही चाहती वह| माँ से जीवन में पहली बार उसने कुछ छिपाया था| आज तक ऐसा कुछ घटा भी तो नही था उसके जीवन में जो छिपाने की जरुरत पड़ती उसे| माँ का प्रेम, माँ को सामने देखकर चाहती थी वह अपना जी हल्का करना| लेकिन दबा रही थी अपने मन की इच्छा| उसी भाव से बोली, "अपनी-अपनी आदत होती है, माँ! देव को सफाई की चिन्ता रहती है| गीजर का पानी टंकी से आता है और रसोई में पानी सीधा नलके से| शुरु से वहम है उन्हें| उसी पानी से नहाते है|"

    उतर अटपता था| माँ सन्तुष्ट नही हुई| बोली, "अजीब बात है बेटा, ऐसा तो नही देखा कभी| एक पतीले पानी से वह एक घंटे तक कैसे नहाते है|" माँ सन्तुष्ट नही थी| वीणा को कुछ उतर भी नही सूझ रहा था| बात बदलते हुए बोली - "चलो माँ, छोड़ो यह सब| आओ, छत पर टहलते है|"

    वे दोनो छत पर आ गई| घर के साथ ही पीपल का पेड़ था| बहुत बड़ा, बहुत पुराना| लगभग तीस फुट उँचा| शीतल वातावरण में उसकी हवा में और अधिक शीतलता थी| वीणा जब भी सुबह-सवेरे थोड़ा बोझिल महसूस करती वही आकर बैठ जाती थी| सीढ़ी के किनारे और पीपल के व्रक्ष की टहनियों को देखती रहती| माँ साथ थी, लेकिन वह चुप थी| माँ को लगा आज जैसे वीणा एकाएक बदली सी लग रही है| जो खुशी पहले देखी थी उसके चहरे पर, वहाँ गम्भीरता विद्यमान थी| वीणा का चेहरा आज उसे बुझा दिखाई दे रहा था| शायद माँ का प्यार था जो उसे सब बदला दिख रहा था|



    गीता में श्री क्रष्ण ने कहा है -

    'जन्म से कुछ नहीहोता| गुण से गुणो का जन्म होता है| जन्म से कर्म का रुप बनता है, परिस्थितियाँ नए-नए कर्म रचती है और स्वभाव के मिश्रण से, ग्यान के भाव से मानव कर्म अपनाता है|

    ऐसे में जन्म से नही निर्धारित होता वर्ण। वर्ण स्वभाव के अनुरुप होता है, वर्ण परिस्थिति के अनुरुप होता है| वर्ण हर प्राणी में, हर भाव में, हर दम, बदल सकता है| ग्यान से, संस्कार से, परिस्थिति से, नित नवीन कर्म से, प्राणी का नियत कर्म निर्धारित होता है| समाज की संरचना में भी सभी वर्ण प्रधान, ग्यानी जन का ग्यान, क्षञिय का बल, वैश्य का व्यापार कर्म और शूद्र का सेवा-धर्म महान है। "

    इन चार भावों की सरंचना से बनता है समाज| यही चारों भाव हर परिवार में भी विद्यमान होते हैं| घर का हर सदस्य किसी न किसी भाव, किसी न किसी कर्म का प्रतीक होता है| सभी अपना-अपना योगदान देते है हर घर में| लेकिन एक प्राणी ऐसा भी होता है, जो इन चारों भावों को अपने में समेटे होता है| वह रुप है माँ का| हर माँ का रुप चतुर्भुजी होता है| माँ के रुप में हर नारी अपने बच्चे के लिए ब्राह्मण बन ग्यान संचारित करती है| माँ के रुप में हर नारी क्षञिय बन अपने बच्चे की रक्षा करती है| माँ के रुप में हर नारी वैश्य बन परिवार का सुचारु रुप से संचालन करती है| माँ ही के रुप में नारी शूद्र भाव से अपने बच्चो की सेवा करती है| परिवार तभी पूर्णता पाता है जब माँ अपने परिवार के उत्थान के लिए चारों भावो से युक्त हो उसकी मंगलकामना करती है| ऐसी माँ हर किसी को अपने घर में मिल जाएगी| यह माँ ग्यान का पुंज है और यही ग्यान का पुंज विद्यमान था माँ निर्मला में|

    एकान्त में वीणा को निहारते हुई माँ पढ़ रही थी वीणा के ह्र्दय में बसी तरंगो को| उसे उसके भीतर एक गहरी चुप्पी छाई दिख रही थी| उन्ही भावों में विचरती बोली - "बेटी, न जाने क्यों मुझे लग रहा है कि तुम जो बाहर से बहुत खुश दिखती हो मुझे, भीतर-ही-भीतर कहीं कुछ सोचती हो हर दम! भीतर-ही-भीतर कई सारे भाव विचरते हैं तुम्हारे मन में| ऐसा लगता है तुम मुझसे कुछ छिपाना चाह रही हो|"

    माँ की उसके ह्रदय में बसे भावों को पढ़ पाने की क्षमता को देखकर वीणा ने अपनी द्रष्टि उठा कर मां को देखा। पलभर में ही उसने अपनी दर्ष्टि हटा ली उसके चहरे से| माँ से कुछ भी छिपा पाना मुश्किल लगा उसे| उसे लगा यह वही माँ है जिससे वह बचपन से लेकर शादी तक अपने मन की हर बात कह देती थी| यह वही माँ है, जिससे उसे मन में बसी किसी भी शंका का समाधान मिल जाता था| यह वही माँ है जो उसकी हर चाह को बड़े प्रेम से थाह देती रही है| वीणा उससे कुछ छिपा न पाई| एकाएक आँसुओं की अविरल धारा बह निकली| वह गोदी में सिर रखकर फफकने लगी|
    माँ निर्मला के कानों को विश्वास नही हो रहा था| ये क्या कहे जा रही है वीणा! देव को कितना सुन्दर, कितना सौम्य- यह कैसा भाव है उसका! कैसा जीवन जी रहा है! अधूरापन देव का जो कितना भयग्रस्त किए है उसकी बेटी को! मन हल्का हुआ तो सोचने लगी, अपनी बेटी के बारे में| कितना विशाल है वीणा का ह्रदय! सब जानकर भी कैसे अपना लिया है उसने देव को ? सब जानकर भी वह उसके परिवार से गिला नहीं रखती| कितनी खुश रहती है वह!

    "माँ, एक ही बात मन में आई| शायद यह मेरे भाग्य में लिखा था| मैने देव के गुणों को अपना लिया| मैने उसके गुणो में जीना सीख लिया| मै उसके दोष को देख नही पाई | यह संस्कार मुझे डैडी से मिले| बचपन से ही सुनती थी, श्री क्रष्ण की वाणी को| बचपन से सुनती थी गीता भाव को कि गुणवानों के गुणो को देखो| गुण में दोष कभी न ढूँढो| मेरे भाग्य में देव का आना लिखा था| मैने अपना सब कुछ उसे समर्पित कर दिया है| अब मेरे जीवन का ध्येयहै देव की मंगलकामना| सब ठीक चल रहा है, माँ|" - कुछ पल चुप रही वीणा, फिर बोली, "मैने सोचा था और स्वयं से वायदा किया था कि किसी को यह बात न कहूँगी| लेकिन मै रह न पायी| आपसे कुछ छिपा न पाई| पिछले हफ्ते अमित से भी कह बैठी अपने दिल का हाल| मम्मी, बस आपसे मेरी विनती है कि इस विषय में आप कभी भी देव या उसके परिवार वालो से कोई जिक्र न करना| मैं खुश हूँ यही सोचती हूँ कि ऐसे ही मेरी खुशी बनी रहेगी| अभी तक सब ठीक चल रहा है और आगे भी ठीक रहेगा|" - वीणा के भाव विनती भरे थे|

    "मन तो बुझ गया है मेरा, बेटी! कैसे अपने मन में यह बोझा छिपाए रह सकती हूँ?" - तब माँ ने कहा|

    "लेकिन यह बोझ मेरे विवाहित जीवन की मंगलकामना से बड़ा तो नही| जो हो चुका उसका अब क्या रोना, माँ! जो हो रहा है, मै उसी से खुश हूँ| यही सोचकर मेरा मन शान्त हो गया है कि ये सब यदि शादी के बाद होता तब हम क्या करते ?"

    _ वीणा ने माँ को तसल्ली देनी चाही|

    "तब यही सोचते कि भाग्य में लिखा था|" - माँ वीणा के भावों को ही व्यक्त कर बैठी|

    "तो यही बात है, यह मेरे भाग्य में लिखा था| मुझे तो जो कुछ भी पता चला है, शादी के बाद ही पता चला है| और मै इसमें किसी पर दोष मढ़ कर भी शान्ति नही पाउँगी| हाँ, कुछ करती तो शादी की पहली रात को ही करती| तब भी बहुत सोचा था, लेकिन फिर यही अपने भाग्य की देन मानकर सहर्ष अपना लिया| अब मै देव को अपना दूसरा रुप मानने लगी हूँ| वह बहुत कष्ट पा चुका है| मै अब उसके कष्टो को कम करना चाहती हूँ| उसकी भावनाओ की थाह लिए रहना चाहती हूँ| अब उसके कष्ट बढ़ाना मेरे बस की बात नही|"

    - वीणा के मन से बहुत बड़ा बोझ हट गया था| एकाएक उसे अपने मन से डर भाग गया लगता था| माँ से कहकर वह बहुत हल्का महसूस कर रही थी स्वयं को और देव जैसे अपने और करीब आया लग रहा था| जैसे आज उसे लगता था कि देव के हर भाव को वह ही नहीं सब जानते है|

    माँ निर्मला चुप रही वीणा की बात सुनकर| गुमसुम-सी बैठी रही| वीणा कुछ देरे माँ को देखती रही फिर बोली, "माँ अब तुम कुछ मत सोचो| चिन्ता मत करो| तुम्हारी बेटी खुश है और इसी में तुम्हारी खुशी है| देव को अपना समझती रही हो अब तक, उसे अपना ही बेटा मान लो| अपना मान लोगी तो तुम्हें स्वयं लगेगा कि जो कुछ भी हुआ है, किसी अच्छे के लिए हुआ है| ऐसे में किसी के साथ तुम्हें गिला नहीं रहेगा|"

    माँ निर्मला का ह्रदय विशाल था, लेकिन इतना भी विशाल नही था शायद कि वीणा के भावो को झट से अपना लेती| ये क्या हुआ उसके साथ? इतना बड़ा धोखा! धोखे में जल्दी-जल्दी बात को घुमा-फिरा कर अखबार के विग्यापन में व्यक्त करके स्वयं को सांत्वना दे दी| यही सोचकर अपने कर्तव्य से विमुक्ति पा ली कि जैसे बेटी वाले है, बोझ है बेटी उन पर, बस लड़के की उपलब्धियों को देखकर ही सब आँखें मूँद लेंगे! ऐसा क्यों कर सोच लिया देव के परिवार वालों ने? अपनी वीणा तो सर्वगुन सम्पन्न है| सबसे निराली| घर भर की चिन्ता करने वाली| अपनी इस बेटी पर तो माँ को सदा से गर्व रहा है| ऐसे में यह सब कैसे हो गया?

    बेटी को देखा माँ ने| वह उसकी गोद में सिर रखें, आँखें मूँदे थी| वह तो सन्तुष्ट है| उसकी सोच सबसे निराली है| उसने देव को अपने जीवन-साथी के रुप में सहर्ष स्वीकार कर लिया है| ये भाव कैसे है? अपनी सभी इच्छाओं, अपनी सभी आकांक्षाओं को समर्पित कर दिया उसनेकितनी सहजता से देव की परिस्थितियों पर! उसके मन की माप सम्भव नहीं| यह कैसा बन्धन है? यह बन्दन मां निर्मला को तो जंजीर लग रहा था| जैसे उनकी बेटी इन जंजीरों में बंध गई है| चाह कर भी उनसे छूटना नहीं चाहती|

    यह समर्पण भाव है, या फिर हालात के सहारे स्वयं को छोड़ देने का कायर भाव? स्वयं से प्रश्न करती निर्मला अपनी बेटी से बोली, "तुम स्वयं को इस भंवर में फंसा तो नही पा रही? हम तुम्हारे साथ है, बेटी! तुम हमारे साथ देहरादून चलो| बैठ कर कुछ निर्णय करेंगे| ऐसा कैसे हो सकता है? इतनी बड़ी बात पर पर्दा और उस पर तुम्हारा चुपचाप सब स्वीकार कर लेना! मुझे तो लग रहा है जैसे अभी भी तुम और किसी बात पर पर्दा डाल रही हो|"

    वीणा उठ कर बैठ गई, माँ की बात सुनकर| बोली, "यह कैसी बात कर रही हो, माँ? मै न कहती तो कैसे पता लगता आपको? जो है, वह कह दिया| मेरा मन हल्का हो गया| और माँ, इससे आगे न मैने कभी सोचा है और न सोच सकती हूँ| आपको ऐसा क्यों लगा कि मैं जैसे यहाँ किसी दबाब में जी रही हूँ? मुझे तो सब ठीक लग रहा है| मैने तो आपको एक बीती कहानी सुना दी| यह कहानी मेरी देखी हुई नही है, लेकिन यह कहानी मुझे अपनी लगती है| देव कोई अभी आकर मिल गया नही लगता| देव का साथ मुझे पिछले जन्मों का सम्बन्ध लगता है| देव का साथ पाकर मै दुःख नही पा रही| कोई कष्ट नही भोग रही| वह मुझे अपना जीवन लग रहा है और उसके हर रुप में स्वयं को उपस्थित पाकर लग रहा है यह साथ मेरे जीवन का उद्देश्य है| अपनी इच्छाएँ मुझे देव की साथी बनकर पूरी होती लग रही है|" - वह भावनाओं में बह कर बोली, "तुम्हें मेरी कसम माँ, इस बात को बिसरा दो| भूल जाओ कि मैने आपको कुछ कहा है|"

    और माँ क्या कहती? देखती रह गई वीणा को| दूसरे के भावों को जी रही वीणा का यह रुप उसे मोहित किए जा रहा था| उन्हें लगा जैसे यह वीणा तो बहुत उपर है सबसे| यह विरक्ति भाव, अपनी भावनाओं से उपर उठकर जीने की तमन्ना एक साधारण-मानव में नही हो सकती| वह जैसे यह जीवन अपने देव के लिए ही जीना चाहती है| अपनी हर इच्छा अपनी हर चाहना जैसे देवे की हर भावना के अनुरुप बनाना चाहती है| यह प्रेम भाव जैसे जन्म-जन्मान्तर के रिश्तों का प्रतीक है| ऐसे में उसे लगा कि वीणा को जिस बात में खुशी मिल रही है उसी भाव में उसे प्रसन्न रहना चाहिए|

    तब प्रेम से निर्मला ने वीणा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "तुम तो मुझसे अधिक सहनशील हो, मुझसे कई गुना समझदार| मुझे गर्व है तुम पर जो पीछे नही देख रही, बस आगे अच्छा देखने की तमन्ना है| तुम चिन्ता न करो, देव के हर भाव में तुम मुझे अपने साथ पाओगी|" - फिर कुछ रुक कर बोली, "मै अपने तरीके से तुम्हारे डैडी जी से बात कर लूँगी| तुम अब किसी से कुछ न कहना|"

    - वीणा माँ के शब्द सुनकर उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर प्यार करने लगी| उसे अपनी माँ दुनियाँ की सबसे अच्छी माँ लगने लगी थी| जी हल्का हुआ दोनों का तब वे नीचे आ गई| देव तब तक नहा कर ड्राईंग-रुम में बैठा था| पास में पन्नालाल भी बैठे थे और दोनों के बीच अखबार की किसी खबर को लेकर बात हो रही थी|

    आँसुओं की अविरल धारा बह निकली पन्नालाल की आँखों से| उन्हें जैसे विश्वास ही न हो रहा था निर्मला के शब्दों में| यह क्या कह रही है निर्मला! कैसे हुआ ये सब? स्वयं को दोषी खड़ा पा रहे थे वह| क्यों वह दोषी नही? बेटी की शादी हो जाए जल्दी से| हाथ पीले करके विदा कर दे जल्दी से| बोझ थी क्या वह जो बिना जाँच-पड़ताल किए "हाँ" कह दी? बिन सोचे-समझे कैसे सब जल्दी से हो गया?

    अखबार का विग्यापन भी नही पढ़ा था उन्होंने| पढ़ते तो शायद डिक्शनरी ही खोल लेते| क्यों लिखा था वैसा, यह जिग्यासा तो शान्त कर लेते| बेटी ने जो कहा, उसी को मान गए| और शेष सब ईश्वर पर छोड़ दिया| देव को देखा था, हर रुप उसका उन्हें अपनी बेटी के अनुरुप लगा| ऐसे में जब सब कुछ हो गया वह अच्छे के लिए ही सोच कर हुआ| ऐसे में अभी तक सब ठीक है, फिर काहे का रोना। जो नही होना उसकी कल्पना में तस्वीर खींचना और उसके लिए शोर मचाना, यह सब उचित नही। ऐसे ही भावों के लिए उन्होंने स्वयं को सांत्वना दी और निर्मला से बोले - "अब जो हो चुका, उस पर नही सोचो| अब जो जैसा है, ठीक है| जैसा मेरी बेटी के भाग्य में लिखा था, जैसा उसके भाग्य में लिखा होगा, वही होगा| अभी तक वह खुश है| अच्छा परिवार है| अच्छे लोग है| बेटी जो चाह रही है, वैसा ही हमें करना चाहिए|"

    इतनी बात कहकर उन्होंने निर्मला को ढाढस बंधाया| पन्नालाल के समभाव को देखकर निर्मला को लगा जैसे वीणा अपने पिता की सोच के अनुरुप ही है| पन्नालाल के ग्यान की बातें, उसके संस्कार जैसे वीणा के रुप में उजागर थे| कितनी सहजता से उन्होंने अपनी पुञी के भावों को अपना लिया था| कभी-कभी हम अपनी सोच अपने तक ही रखना चाहते है, दूसरे की सोच में हमें शायद अपने भाव भरने अच्छे नही लगते| पन्नालाल की भी यही प्रक्रति थी| निर्मला भी अपने मन को तसल्ली दे रही थी| दोनों ने एक-दूसरे को तो समझा दिया, लेकिन दोनों का मन अपने आप में बोझिल हो गया था|