• Chapter 21   Nayi Subah

  • सांताक्रुज एयरपोर्ट से बाहर आते ही टैक्सी वालों से मालूम पड़ा की बम्बई बन्द है - शिव सेना वालों ने हड़ताल करवा रखी है और सड़कों पर ट्रैफिक नहीं चलने दिया जा रहा| वहाँ से कोलाबा पहुँचना लगभग असम्भव था| अब क्या करें? तभी वीणा को ध्यान आया| उसके दूर के रिश्ते की माँसी का एक लड़का अन्धेरी में कहीं रहता है| लेकिन घर का पता भी नहीं था| हाँ, उसे याद आया, उसकी सास का पैट्रोल पम्प है| वहीं सांताक्रुज के पास| उसने देव को बताया और टैक्सी वाले ने पूछा - "अन्धेरी तक नहीं जा पाएँगे|"

    "वो तो नजदीक है, उसे तरफ अभी गड़बड़ नहीं है| वहाँ तो जा सकते है|" टैक्सी वाले न कहा|

    "लेकिन हमारे पास पता नहीं है, बस इतना मालूम है उनका सांताक्रुज में पैट्रोल पम्प है|"

    - वीणा ने तब उसे बताया|

    "सांताक्रुज में तो पाँच-छः पैट्रोल पम्प है| नाम मालूम है पैट्रोल पम्प का?"

    "नाम तो मालूम नहीं, हाँ उस पम्प को एक औरत चलाती है| वही उसकी मालकिन है|"

    - वीणा ने और कोशिश की जानकारी देने की|

    "अरे, शरद पैट्रोल पम्प की बात कर रही हैं आप| चलिए| वह तो बस यहीं पास में है|"

    -टैक्सी वाले के मुँह से यह सुनकर सभी ने राहत की साँस ली और टैक्सी में समान रखकर पैट्रोल पम्प की ओर चल दिए|

    ड्राईवर सीधा पैट्रोल पम्प पर उन्हें ले आया| वीणा और देव टैक्सी से उतर कर पम्प के आफिस में गए| बहाँ बैठी महिला को वीणा एक नजर में पहचान गई| वह तीन-वर्ष पहले देहरादून में उनके घर आई थी और वहाँ दस दिन रही थी| महिला ने भी वीणा को देखते ही पहचान लिया - खुशी से लपक कर उठी और उसे गले लगाती हुई बोली - "अरे! वीणा बेटी! ऐसे अचानक! मै कोई सपना तो नही देख रही|"

    "देख लीजिए| आपका पता ढूँढ़ लिया| चले थे तो ध्यान भी नहीं रहा कि घर से आपका पता मंगवा लेती| इनसे मिलिए ये मेरे पति हैं देव." - वीणा ने देव का परिचय दिया| तब देव ने उन्हें प्रणाम किया|

    वीणा ने तब उन्हें बताया "एयरपोर्ट से मालूम पड़ा कि बन्द के कारण सभी रास्तों में काफी तोड़फोड़ हो रही है| इसीलिए इधर आपके पास चले आए|

    "अरे| कमाल है| अपना घर है चलो तुम वहाँ अजय होगा|" तब उन्होंने टैक्सी वाले को घर का पता बता दिया| "मैं शाम को आउँगी तभी बात करेंगे|"

    देव-वीणा ने तब उनसे विदा ली| अमित तब टैक्सी में ही बैठा था|

    अजय उस समय घर पर ही था| वीणा व उसके पति को देखकर बड़ी गर्म जोशी से उन्हें मिला| बातों ही बातों में देव ने उसे बीमारी का बता दिया| सब समाचार सुनकर अजय का मन बुझ-सा गया| सहानुभूति उसके मुख से निकला, "आप लोग यहीं रहकर अस्पताल आ जा सकते हैं| नेवी नगर से तो टाटा इन्स्टीट्यूट दूर पड़ता है|"

    "नहीं, हम आप लोगों को कष्ट नही दे सकते| व्यर्थ में इतनी परेशानी होगी आपको| मेरे भाई ने हमारे लिए कुछ-न-कुछ इन्तजाम कर लिया होगा...|" - देव ने उसकी बात का उतर दिया|

    "परेशानी कैसी...| इसे आप अपना घर ही समझिए|" अजय ने जब यह कहा तो उसकी पत्नी रश्मि उठकर कमरे से रसोई की तरफ चली गई| उसके चेहरे के भाव वीणा को कुछ अच्छे नहीं लगे|

    पाँच-सात मिनट बाद रश्मि ने अजय को किचन से पुकारा, "अजय, जरा भीतर आना| चाय तैयार है|" अजय उठने को हुआ तो वीणा ने उससे कहा, "तुम बैठो अजय| मैं जाती हूँ|" इससे पहले कि अजय कुछ बोलता वीणा भीतर चली गई| लेकिन रश्मि शायद अजय को ही बुलाना चाह रही थी| वीणा ने देखा रश्मि कुछ चुप-सी है| लेकिन उसके मनोभावों को पढ़ने की अपेक्षा मुस्कान बिखेरते हुए बोली - "लाओ, मैं तुम्हारी मदद करुँ?"

    "नहीं आप रहने दें| आप बैठिये, प्लीज, जरा अजय को ही भेज दें|" - उसने अपने चेहरे पर मुस्कान बिखेरने की चेष्टा की - "बाजार से कुछ मंगवाना है|"

    "अरे नहीं, तकल्लुफ की कोई बात नही...|" वीणा ने कहा| लेकिन रश्मि ने उसे फिर से कहा - "आप प्लीज बैठिये|" वीणा समझ गई| शायद पति-पत्नी की कोई बात हो|

    "अच्छा, जैसा तुम ठीक समझो| अभी भेजती हूँ अजय को| - वीणा उलटे पैर वापिस चली आई| भीतर आकर उसने अजय से कहा - "जाओ अजय, रश्मि तुम्हें ही बुला रही है|"

    अजय मनमना-सा उठा| भीतर गया और रश्मि से बोला - "बोलो, डार्लिंग|"

    "ये डार्लिंग-वार्लिंग छोडों। इस छोटे से घर में तुम इन्हें किस बात पर कह रहे हो रखने के लिए| फिर सुना नहीं, उसके पति को कैंसर है| मैं तो घर में खाना नही खा सकूँगी|"

    "अरे| यह कोई छूत की बीमारी तो नहीं| जानती हो, मैं देहरादून में उनके घर महीनों रहा हूँ| मेरी कितनी आवभगत की थी...|"

    "वह तो ठीक है, लेकिन किसी बीमार को घर में रखना अपने बस की बात नहीं|" रश्मि ने साफ शब्दों में कहा, "फिर हम भी तो मम्मी के पास रह रहे हैं| उनकी छूआछूत को भी तुम जानते हो|"

    "क्या कह रही हो, रश्मि| वो अपने है उनसे कैसी छूआछूत| मम्मी से पूछना, मम्मी की कितनी सेवा की थी उन्होंने|" - अजय को अपनी पत्नी की बात पर गुस्सा आ रहा था| लेकिन जैसे कुछ अधिक कह सकने की हिम्मत नहीं थी उसमें|

    "...तो हम भी उनकी मम्मी की सेवा कर देंगे| - बस, अब तुम उन्हें बार-बार रुकने को नहीं कहोगे| जब बन्द खुल जाएगा तो स्वयं कोई सवारी का इन्तजाम करके या स्वयं उन्हें छोड़ आना तुम|" - रश्मि ने अपना फैसला स्पष्ट सुना दिया अजय को|

    अजय शायद रश्मि को नाराज नहीं करना चाहता था या उसे उसको नाराज करने की हिम्मत ही नही थी, उससे बोला, "चलो ठीक है, कुछ न कुछ तरीके से उन्हें भेज देंगे| अभी तुम अपना मूड ठीक करो|" - वह बाहर चलने को हुआ कि रश्मि ने कहा - "अब चाय भी उठा कर ले जाओ| वरना वह समझेंगे न जाने क्या बात कर रहे थे|"

    अजय ने तब कुछ नही कहा| रश्मि ने चाय की ट्रे उसके हाथ में थमा दी| अजय को चाय लाता देखकर ही वीणा समझ गई कि बाजार भेजने के बहाने रश्मि उससे कुछ कहना चाह रही थी| क्या कहना चाह रही थी, वह समझ गई| उसने भी मन में ठान लिया कि वह भी यहाँ ज्यादा देर नहीं रुकेंगे|

    चाय समाप्त करके वह स्वयं देव से बोली, "देव तुम भाई साहब से फोन पर बात कर लो| वह भी चिन्ता कर रहे होंगे| उनसे ही कहो किसी सवारी का इन्तजाम करके हमें ले जाँए|"

    "अरे| ऐसी क्या बात है? इतनी जल्दी क्या है." - अजय ने एकदम से कहा| अजय की जैसे मन माँगी मुराद मिल गई थी| वीणा ने उसके चहरे पर राहत के चिन्ह भाँप लिए थे| बोली, "नही अजय, भैया हमारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे| हमारा उन्ही के पास जाना ही उचित रहेगा|" - वीणा ने अपने शब्दों पर जोर डालते हुए कहा, इस पर अजय बोला "मैं तो केवल रिक्वेस्ट ही कर सकता हूँ आगे आपकी मर्जी| अभी कुछ देर आराम कर लीजिए| शोर-शराबा थोड़ा कम हो जाएगा| शाम को मैं ही शिवसेना की ऐम्बूलेंस का इंतजाम कर दूंगा। उसमें जाने से कोई कठिनाई नहीं होगी|"

    वीणा ने देखा रश्मि के चहरे पर तब वही मुस्कान उतर आई थी जो उनके आने के समय उसने बिखेरी थी।

    रमेश ने उनके ठहरने के लिए इन्तजाम कर लिया था| नेवी नगर में ही एक आफीसर एक महीने की छुट्टी जा रहा था। उसने उसके फ्लैट की चाबी ले ली| और उनको वहीं ठहरा दिया| वह स्वयं मेस में ठहरा था| मालती व बच्चे अभी गोवा में ही थे| देव को खाने पीने का काफी परहेज था, इसलिए उन्हें फ्लैट में ठहर कर अच्छा लगा| वीणा उसके लिए स्वयं खाना बना सकती थी|

    अगले दिन अस्पताल जाने से पहले वे लोग चर्च गेट गए| वहाँ उन्हें मिस्टर शाह से मिलना था, जो संस्था के वरिष्ठ सदस्य थे| देव को, मिस्टर शाह की हैसियत नहीं मालूम थी| जब वे सभी उनके आफिस पहुँचे तो अमित व वीणा को एक बार झिझक हुई| मिस्टर शाह का आफिस व कम्पनी देखकर ही उन्होंने अनुमान लगा लिया कि वह कोई बहुत बड़े बिजनेसमैन है| रिसैप्शनिस्ट को अपना परिचय दिया देव ने और वे प्रतीक्षा करने लगे| क्षण भर पश्चात् ही अन्दर से बुलावा आ गया| वीणा व अमित बाहर ही बैठे रह गए| देव अकेला भीतर गया|

    मिस्टर शाह अपने कमरे में अकेले थे| देव को देखकर उन्होंने खड़े होकर देव के अभिवादन का उतर दिया और उसे बैठने को कहा| इससे पहले की देव कुछ कहता, वह बोले - "मुझे आज सुबह ही मिल्टर गर्ग का फोन आया था| उन्होंने सारी बात बताई| आप चिन्ता न करें| मैं अभी फोन करके डाक्टर सामन्त से आपकी डेट फिक्स करवा देता हूँ| वह आपका अच्छी तरह से निरीक्षण करेंगे, ओर उसके बाद जो होगा वह तय कर लेंगे|"

    "आपका बहुत-बहुत शुक्रिया|" देव तब इतना कह सका| मिस्टर शाह फिर देव से उसकी बीमारी का पूछने लगे| देव ने विस्तार से उन्हें सब बता दिया| तभी जैसे कुछ ध्यान हो आया मिस्टर शाह को, बोले, "आप दिल्ली से अकेले आए है क्या...?"

    "नहीं-नहीं, मेरी पत्नी व मेरा छोटा भाई मेरे साथ हैं| वह बाहर बैठे है|" देव ने उन्हें बताया|

    "अरे| आपने उन्हें बाहर क्यो बिठाया है?" इससे पहले कि देव कुछ कहता, मिस्टर शाह ने इन्टरकाम पर अपनी रिसैप्शनिस्ट को वीणा व अमित को भीतर भेजने को कहा|

    क्षण भर पश्चात् ही अमित व वीणा भीतर आ गए| मिस्टर शाह ने उठकर उनका स्वागत किया और वीणा से कहा - "मैडम, आप बिल्कुल फिक्र न करें| मुझसे जो बन पड़ेगा मै मदद करुँगा| उपर वाला सबकी मदद करता है|"

    वीणा केवल मुस्कुरा सकी उनकी बात सुनकर| एक अजय व रश्मि का व्यवहार और दूसरा मिस्टर शाह का| कितना अन्तर दिखा उसे अपने और पराये में!

    "देखिए! ओ.पी.डी. दो बजे शुरु हो जाती है| आप यहाँ से सीधे चलकर वहीं पहुँच जाईए| मै अभी डाक्टर सामन्त से बात कर लूँगा| अपना कार्ड बनवाकर आप सीधे ही उनकी सेक्रेटरी के पास चले जाना| वह आपको उनसे मिलवा देगी| कोई परेशानी हो तो आप मुझे फोन कर दीजिएगा| मै सब संभाल लूँगा|"

    तब देव ने सबको उठने का इशारा किया| वे लोग उठे तो मिस्टर शाह ने उठते हुए देव से हाथ मिलाते हुए कहा - "मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं| ईश्वर आपकी रक्षा करेगा|"

    वे सब उनका अभिवादन कर बाहर आ गए|

    डाक्टर सामन्त ने देव की सभी रिपोर्टस ध्यान से पढ़ीं| ऐसे केस उनके लिए आम-सी बात थी| बोले - "देखिए| फाईनल स्टेज तो नही आई लेकिन अब एक बात तो आपको समझ लेनी चाहिए, अब दवा से ज्यादा दुआ काम आएगी| मै आपको दवाईयाँ लिख देता हूँ| वह नियमित रुप से लेते रहिए और कल से ही रेडियोथरैपी करवानी शुरु कर दीजिए|...."

    "रेडियोथरैपी से कोई फायदा होगा, डाक्टर." देव ने पूछा|

    "हाँ, फायदा इतना होगा कि रोगाणु कम से कम स्पीड से फैलेंगे|" बीमारी जड़ से तो खत्म नहीं होगी, लेकिन उसकी रफ्तार धीमी पड़ जाए यही हमारी कोशिश हो सकती है|" देव ने महसूस किया कि कैंसर का इलाज करते समय डक्टर अपनी-अपनी अलग राय रखते हैं| कोई मरीज को आशा की किरण दिखाता है और कोई निराश कर देता है| डाक्टर सामन्त ने तब दवाई लिख दीं और पर्चा देव को थमाते हुए बोले - "आप अभी रेडियोथरैपी डिपार्टमेंट में चले जाईए और कल का कोई समय ले लीजिए|"

    बस इतनी सी बात हुई डाक्टर सामन्त से| देव अपने साथ वीणा व अमित को लिए रेडियोथरैपी डिपार्टमेंट की ओर चल पड़ा| अगले दिन सुबह नौ बजे का समय लेकर वे लोग नेवी नगर लौट आए|

    तीनों चुप थे| इस गहन चुपी को कोई तोड़ना नही चाहता था| लेकिन एक बात थी कि सच को सबने अपने गले से नीचे उतार लिया था| शाम को अमित ने विस्तार से सब बात रमेश भाई को बता दी| वे उसे बहुत अधिक चिन्तित लगे|

    रेडियोथरैपी शुरु हुए सात दिन हो गए थे| डाक्टर मालती थी जो देव का ट्रीटमेंट कर रही थी| वीणा देव के पास बैठी रहती थी| डाक्टर मालती को बातों से मालूम हुआ देव के विषय में| वह उनसे काफी घनिष्ट हो गई थी| ऐसे में एक दिन जब वीणा ने उनसे पूछा - "डाक्टर! देव को इससे कुछ आराम मिलेगा भी?"

    तब मालती देव को ही निहार रही थी| मन में सोच रही थी कि इस मरीज के चहरे को देखकर भला कौन कह सकता है कि यह बस कुछ दिनों या कुछ महीनों का मेहमान है| वह स्वयं भावुक हो उठी| तभी वीणा ने उसकी भावुकता को ओर बढ़ा दिया| अभी जूनियर डाक्टर थी लेकिन अपने मरीजों की मनोदशा को समझती थी| एकाएक उसकी आँखें भर आई| बोली वीणा से, "मै तुम्हें देखती हूँ वीणा तो बड़ा अजीब लगता है| कैसे सह रही हो यह सब? तुम्हारे पति को देखती हूँ तो सोचती हूँ कि ऐसा क्या इसी इन्सान के साथ करना था ईश्वर को? कितनी सुन्दर जोड़ी है तुम्हारी! लेकिन इस रेडियोथरैपी से देव को कुछ नही मिलने वाला| जो होना था वह तो हो चुका| अब तो इस जिन्दगी को यदि कोई सुख दे सकता है तो वह केवल भगवान ही है| और कोई नहीं| मै पहले दिन ही कह देती| लेकिन फिर सोचा तुम दोनो पढ़े लिखे हो| डाक्टर से सारी बात कर आए हो| न जाने क्या है तुम्हारे मन में| लेकिन अब देखा, इतने दिनों से कि तुम सब जो कुछ समझ रहे हो, सच उससे अलग है| मैं जूनियर हूँ| अभी शुरुआत है मेरे डाक्टरी जीवन की| लेकिन पाया है कैंसर का इलाज करते समय हम सब अन्धेरे में तीर चलाते है| सब कुछ करके देखते है| शायद मरीज बच जाए|"

    "आपकी राय में इस रेडियोथरैपी से कुछ फायदा नहीं होगा?" देव ने पूछा डाक्टर से|

    "फायदा नही होगा, बल्कि नुकसान ही होगा| तुम्हारे आखिरी दिनों में दर्द-तकलीफ ज्यादा होगी|" डाक्टर मालती ने साफ शब्दों में कहा|

    "फिर मुझे क्या करना चाहिए|.... मेरा कोई इलाज?" - देव जैसे स्वयं को तैयार कर चुका था|

    "इस अवस्था में कोई नहीं| बस, हिम्मत नहीं हारनी चाहिए|" डाक्टर मालती ने आँसू पोंछ लिए थे, क्योंकि तब वीणा फूट-फूट कर रोने लगी थी| डाक्टर मालती उसे चुप कराने लगी थी|

    थोड़ी देर में देव की थरैपी पूरी हो गई| अगली तारिख के लिए डाक्टर मालती ने कार्ड में जैसे ही लिखना शुरु किया तब देव ने कहा - "नही डाक्टर, मै अब नही आउँगा| मै कल ही दिल्ली चला जाउँगा|" तब डाक्टर मालती ने कुछ सोचा और कहा - "जैसा तुम ठीक समझो|" मैं भी तुम्हारे लिए ईश्वर से प्रार्थना करुँगी! इससे पहले कि देव व वीणा बाहर निकलते वह उठकर बाथरुम में चली गई| शायद वह अपनी रुलाई नहीं रोक पा रही थी|