• Chapter 22   Nayi Subah

  • निराश मन लिए वे लौट आए| रमेश ने बहुत समझाया, ढाढ़स बंधाया, वे नही माने| अमित चुप था| बिल्कुल गुमसुम| उसने स्वयं को असहाय पाया, वीणा के लिए कुछ करना चाहता था, कोई जादू-टोना नही जानता था, जो कुछ कर पाता।

    वीणा थी कि हँसी भूल गई थी| बस बात-बात पर आँसू बहाती थी| लेकिन न जाने किस मिट्टी की थी कि वह देव की बुराई नहीं सुन पाती थी| देव की, देव के परिवार की बुराई करने वाला उसे अपना दुश्मन लगता था| यहाँ तक कि अपनी बड़ी बहन सुनीता भी बुरी लगने लगी थी जब से उसने दिल्ली आकर देव के प्रति ढ़ेर-सी शिकायतों का पुलिन्दा वीणा के सम्मुख खोला था, अपनी हमदर्दी जताई थी उसने जब वीणा के प्रति यह कह कर कि "वीणा| तुम्हारे साथ धोखा हुआ है, चलो यहाँ से| नही रहना तुम्हें यहाँ, देव के साथ| क्या दिया है उसने तुम्हें| नौकरानी से बदतर जिन्दगी बन गई है तुम्हारी|"

    यह सुनकर वीणा बहुत रोई थी| और जब चुप हुई तो दो शब्द बोलकर उसने सुनीता का मुँह बन्द कर दिया था - "बड़ी बहन हो फिर भी अपनी छोटी बहन का सुहाग उजाड़ना चाहती हो| मुझे नही चाहिए तुम्हारी हमदर्दी| मेरे देव में कोई खोट नही| यदि दोष है तो केवल मेरे भाग्य का| बस, आज के बाद तुम इस विषय में कोई बात नही करना|"

    कुछ देर तो सुनीता चुप रही, लेकिन बड़ी बहन थी उसकी| हितैषी भी थी वीणा को बोलने से रह नहीं पाई - "तुम कौन से युग की बात कर रही हो? सच्चाई तुम्हारे सामने है| शादी के बाद एक दिन भी सुख का मिला है तुम्हें? शादी की है, शादी होती है क्या बस सुबह-शाम, दिन-रात पति के सिराहने बैठकर उसकी मालिश करने के लिए? उसे जब-तब दवाई खिलाने के लिए? उसकी गन्दगी साफ करने के लिए? उन्हें शादी करनी जरुरी थी क्या, इस सबके लिए? एक नर्स ही रख लेते, भाई अमीर है सब खर्च सहन करते, क्या नर्स का खर्च सहन नहीं कर सकते थे?"

    "बस भी करो दीदी तुम, मुझसे नही सुना जाता यह सब" - वीणा ने आँसू बहाते हुए कहा|

    "क्यों बस करुँ? आज तुम्हें मैं दुश्मन लग रही हूँ - तुम्हारे सुहाग की दुश्मन| कल जो होना है उसे तुम जानती हो, क्या कर लोगी तुम? कैसे काटोगी तुम जिन्दगी|" - सुनीता बहुत स्पष्टवादी थी| शब्द वही प्रयोग करती थी, जो उसका मन कहता था| चाहे कितने कठोर शब्द क्यों न हो|

    "मुझे कल क्या करना होगा, अभी नही सोच रही| बस मुझे आज की चिन्ता है| मुझे अपने देव की चिन्ता है| वह मेरा है और उसे मुझसे कोई अलग नही कर सकता|" वह रो रही थे और रोते-रोते बोले जा रही थी - "मुझे देव से शारीरिक सुख नहीं प्राप्त हुआ, इसका मुझे कोई गम नही| मेरी शारीरिक भूख से ज्यादा बड़ी भूख मेरे मन की है| मेरा मन देव को पाकर त्रप्त हो गया है| उसे बीमारी न होती तो क्या कमी थी उसमें? बोलो - जब वह देहरादून आया था तो कैसा लग रहा था तुम्हें? देवताओं की छवि देखी थी तुमने भी उसमें| कैसा तेज उसके चहरे पर महसूस किया था| आज वह अपनी जिन्दगी के लिए तड़प रहा है तो मैं उसे छोड़ जाउँ? इतनी जल्दी साथ छोड़ने के लिए नहीं हुई मेरी उससे शादी| वह अच्छा इन्सान है, उससे तब तक बधीं हूँ जब तक वह है| उसका नाम है| वह नही रहेगा अभी से उसकी कल्पना नही कर सकती| अभी आशा है, शायद कोई चमत्कार हो जाए| उसके नही तो मेरे भाग्य से ही|" - वीणा चुप हुई तो सुनीता को उस पर बहुत प्यार आया| उसे अपनी बाँहो में भरकर उसे पुचकारते हुए बोली - "मै तुम्हारे मन की समझती हूँ| लेकिन पगली मैं तेरी दुश्मन हूँ क्या? तुझे यूँ तिल-तिल कर पल-पल बिताते देखकर मै चुप देखती रहूँ| अच्छा लगेगा मुझे ऐसा? तेरे साथ बचपन बिताया है सारा| हर खुशी, हर दुःख में साथ दिन बिताये है| मुझे अच्छा नही लगता तेरा यह रुप, मैं क्या करुँ? कोई उपाय मेरे पास भी तो नही? काश! मैं कोई जादू-चमत्कार कर सकती| लेकिन क्या है? दिखता कुछ नहीं, बस धोखे के सिवाय| मेरी बुध्दि मेरे हिसाब से ही चलती है|" - तब सुनीता भी बहुत रोई थी|

    रीटा देव के साथ खालसा कालेज में लेक्चरार थी| देव से मिलने आई| तब देव सो रहा था| वह वीणा के पास बाहर ही बैठ गई| देव के विषय में पूछने के बाद वह बोली - "कल मेरे एक रिश्तेदार आए थे घर| उन्होंने मुझे बताया कि यहाँ दिल्ली बार्डर पर एक गाँव है बकोली| वहाँ एक बाबा जी रहते है, अनाथ आश्रम बना रखा है उन्होंने। साथ ही वह जड़ी-बूटियों से कई असाध्य बीमारियों का इलाज करते है| तुम एक बार देव को लेकर वहाँ चली जाओ| शायद कुछ चमत्कार हो जाए|"

    रीटा की बात सुनकर वीणा के चेहरे पर आशा की किरण चमक उठी| वह बोली - "हाँ, जरुर जाउँगी मैं| कल ही| अभी अमित आएगा, आप उसे सही पता बता देना|"
    तब रीटा ने कहा, "पता बिल्कुल आसान है| अलीपुर से आगे बकोली गाँव में जाकर किसी से भी पूछ लेना बकोली वाले बाबा जी का पता|" - फिर कुछ सोचकर रीटा बोली - "तुम कहो तो मै अपने रिश्तेदार को लेकर कल सुबह आ जाती हूँ|"

    "नही-नही, आप कष्ट न करें| मेरे साथ अमित आएगा| कोई परेशानी होगी तो मैं आपको बता दूँगी|" वीणा के चेहरे पर आशा की कई किरणें चमकने लगी थी| रीटा चली गई और वीणा अपनी सास के पास जाकर सब बात बताने लगी| देव अभी सो रहा था|

    सुबह सात बजे ही देव, वीणा और अमित बकोली पहुँच गए| आश्रम ढूँढने में कोई कठिनाई नहीं हुई| आश्रम में उस समय प्रार्थना हो रही थी| उन सभी को वहाँ पहुँच कर बहुत अच्छा लगा| वहीं खड़े एक सज्जन से उन्हें जानकारी मिली कि बाबा जी ने इस प्रांगण में अनाथ बच्चों के रहने की पूरी व्यवस्था के साथ-साथ, एक पाठशाला भी खोल रखी है और सुबह के समय लगभग चार घंटे रोगियों को निःशुल्क दवाईयाँ बाँटने का कार्य भी करते हैं|

    वहीं एक चबूतरे पर जाकर तीनों बैठ गए| अभी उनसे पहले केवल एक व्यकित और वहाँ बैठा था| दस-पन्द्रह मिनट की प्रतीक्षा के बाद बाबा जी वहाँ आ गए| तब तक करीब बीस लोग वहाँ आ चुके थे| देव का नम्बर दूसरा ही था| बाबा जी ने देव की नाड़ी की परीक्षा की| फिर बोले - "पेट की बीमारी से ग्रस्त हो तुम, लेकिन अब रोग बढ़ चुका है|"

    "जी बाबा जी, मेरा तीन वर्ष पहले आपरेशन हुआ था और मेरा गुदा ही निकाल दिया था|" अभी देव ने इतना ही कहा था कि बाबा फिर बोले - "ओह! तो तुम्हारे क्रत्रिम मल द्वार बनाया हुआ है| और कैंसर दुबारा फैल गया है|" - देव को आशा नहीं थी कि बाबा को इतनी जानकरी होगी| उसका विश्वास जो कि वीणा का बनाया था, स्वयं बढ़ गया बाबा के प्रति| स्वीक्रति में देव के हाथ स्वतः ही जुड़ गए| तब बाबा बोले - "देखो बेटा, तुम्हारा रोग इतना अधिक बढ़ गया है कि मैं तुम्हें कुछ निश्चित होकर नही कह सकता| लेकिन ईश्वर की इस बनाई हुई प्रक्रति से कई जड़ी-बूटियाँ मैंने इकट्ठी की हुई है| उनके सेवन से तुम्हारे विकारों का वेग कम जरुर हो जाएगा| आगे सब उसी ईश्वर पर निर्भर करता है| मैं तुम्हें दवाई दे देता हूँ नियमित रुप से इसका सेवन करते रहना|"

    तब बाबा जी ने उन्हें प्रतीक्षा करने को कहा और भीतर अपनी कुटिया में चले गए| बाहर लौटे तो उनके हाथ में एक लिफाफा था जिसमें कई जड़ी-बूटियाँ पड़ी थी| अपने एक शिष्य को उन्होंने पुकारा और समझाया - "सबको पीस कर कपड़छन कर दो और इनकी बराबर तीस पुड़िया बना देना|" फिर देव के आमुख होकर बोले - "नित्य चार पुड़िया खानी होगी दूध के साथ| चाय, खट्टा सब बन्द| हल्का खाना और रसदार फल खाते रहना| दर्द के लिए तेल भी अभी दूँगा|"

    तब देव, वीणा व अमित ने झुक कर बाबा जी के चरण स्पर्श किये| और वही मन्दिर के बरामदे में जाकर बैठ गए| दवाई तैयार होने में अभी देर थी|

    एकाएक सब बदलने लगा| डर व्यक्ति को बहुत क्षीण कर देता है| मानसिक तनाव में बीमारी की गति भी तीर्व हो जाती है| मन अच्छा है तो सब अच्छा लगता है| मन दुःखी तो सब बदला-सा लगने लगता है| वीणा ने देखा, देव बुझ-सा गया है| चेहरे का तेज लुप्त हो गया है उसका| घर में जब भी अकेला पड़ता न जाने क्या सोचकर आँसू बहाने लगता| काया क्षीण पड़ गई थी उसकी| दाँयी टाँग अब दर्द के कारण नीचे नही रख पाता था| जब भी उठता वीणा का सहारा लेकर या फिर लाठी के सहारे| समय की मार ने उसे अधमरा कर दिया था| आज वीणा का सहारा था या फिर उस लाठी का सहारा| वही लाठी जो वह अपने बाबूजी के लिए खरीद कर लाया थाकभी उनको बुढ़ापे में सहारा देने को, आज वह उसका सहारा बनी हुई थी। और दूसरी लाठी उसे वीणा के रुप में ईश्वर ने प्रदान कर दी थी| न जाने उसके किन अच्छे कर्मों का परिणाम थी वीणा! जिसने उसके जीवन में आकर जीने की तमन्ना बढ़ा दी थी|

    वीणा को देखकर आँसू बरबस उसकी आँखों से बह निकलते थे| और वीणा थी न जाने किस मिट्टी की बनी गुड़िया| इस दुनियाँ में आई, बड़ी हुई - ब्याह रचाया - सुन्दर कल्पनाएँ की अपने भविष्य की| और देखते-देखते सभी कल्पनाएँ पंख लगा कर उड गई| जीवन के ऐसे सत्य की उसने कभी कल्पना नहीं की थी|
    रोती थी, कभी बाथरुम में जाकर, कभी अमित कि पास बैठकर, कभी क्रष्णा की गोदी में सिर रखकर, लेकिन देव के सामने आकर भूल जाती थी अपने सब दुःख| बस उसे ही दिलासा देती थी|

    बाबा जी की दवाई से कोई चमत्कार नहीं हुआ| किसी साधु-महात्मा को खाना खिलाकर चमत्कार नहीं हुआ| महाम्रत्युंजय का जाप करके भी कोई फल सामने नहीं आया| हाँ, एक महीना और बीता तो पाया अब सिर के पिछले भाग में कोई फोड़ा सा निकल आया है| देव ने छुआ उसे हल्का-सा दर्द महसूस हुआ| वीणा को अपने मुँह से बताना चाह कर भी नहीं बोल पाया| बस, रुंधे गले से बोला - "अब कुछ नहीं शेष बचा, वीणा| अब मेरा-तुम्हारा कुछ दिनों का और साथ रह गया है| बस अब मैं चला जाउँगा." - रुलाई रोक नहीं पाया देव|

    वीणा ने सुना, देखा उसे, निकट आकर देव के सिर में हाथ फेरने लगी| देव शायद यही चाहता था| पल भर में वीणा को पता चल गया कि क्यों फिर देव आज वही पुरानी बात दुहरा रहा है|

    "ये क्या देव, एकाएक यह फोड़ा कैसे हो गया?" वीणा देव के सिर के बालों को अपनी अंगुलियों से हटाते हुए बोली "रात तक तो कुछ नही था|"

    "बस, अब कुछ नही रहा शेष| लगता है ये कैंसर मेरे शरीर में फैल गया है|" देव के आँसुओं का वेग बढ़ने लगा था|

    "देव! ऐसा मत बोलो| अपने मन को काबू में रखो| अभी कुछ नही हुआ| अभी चलते है डाक्टर के पास... वही बताएगा क्या है यह?" वीणा बोली, जैसे अभी भी डाक्टर का सहारा शेष बचा हो उसके पास|

    "कौन से डाक्टर के पास? - कौन है जो इस घड़ी कह रहा हो कि अभी कुछ नही बिगड़ा, अभी देव बच सकता है?" - देव का आक्रोश था जो फूटा, लेकिन वीणा उसे सभाँलते हुए बोली - "डाक्टर के न सही, बाबा जी के पास चलते हैं| कुछ न सही, इसको बढ़ने से रोकने की दवा हमें शायद उनके पास से मिल जाए - वीणा हिम्मत जुटा रही थी|

    लेकिन देव की दशा उसके विपरीत थी, बोला - "बहुत भोली हो वीणा, अब क्या करेंगे बाबा जी? उन्होंने कहा था कि रोग बहुत बड़ चुका है, इसके वेग को कम करने की कोशिश करेंगे।"

    "ईश्वर पर विश्वास करने को भी कहा था|" बोली वीणा - "देव! अब तुम कुछ हठ न करो| मुझे दे दो सब चिन्ताएँ अपनी, सब दुःख अपने| मै रोक सकी तो रोक लूँगी सब कुछ| अब तुम मेरे भाग्य को मुझे स्वयं बनाने दो| तुम अब मेरे विश्वास को सहरा दो| मुझे अपने लिए कुछ करने दो|" - वीणा रो भी रही थी, लेकिन अपनी वेदना को अपने शब्दों में व्यक्त करने की कोशिश भी कर रही थी|

    देव ने समझा उसे| उसके मनोभावों को| समझाया स्वयं को और बोला - "तुम जो कहोगी, जो चाहोगी , वही करुँगा| तुम आसूँ न बहाओ, जहाँ ले चलोगी वही चलूँगा|"

    "बस, अब चलो बाबा जी के पास|" वीणा ने निर्णय सुनाया - तुम्हें मैं झटपट तैयार करती हूँ, अब जो भी होगा देख लेना चमत्कार ही होगा|" - सच की रोशनी इतनी तीर्व हो चुकी थी कि वीणा की आँखें चौंधिया-सी गई थीं उसमें| कुछ शेष दिखाई देना बन्द हो गया था| सच, कैसा है इसका वर्णन तो वह बन्द आँखों से कर नही सकती थी| उसे लग रहा था, सच है उसका देव| देव का जीवन, जिसे उससे कोई छीन नहीं सकता|