• Chapter 27   Nayi Subah

  • तीन महीने हो चले थे वीणा को देहरादून से आए| केवल दो ही बार गई थी वह घर माँ से मिलने| इस बीच अमित ने भी उसे तीन पञ लिखे थे| घर की बातों के सिवा वह उसे और कुछ नही लिखता था| माँ ने खबर दी सुनीता के आने की| दो दिन की छुटी मिल पाई उसे केवल। सुनीता से मिलने को वह भी बहुत उतावली थी| घर पहुँचते ही उससे लिपट गई|

    रात को दोनो अलग बैठी तो बात सुनीता ने चलाई| वह बोली वीणा से, "वीणा भविष्य के बारे में सोचा है कुछ?"

    "सोचना कैसा? अच्छा ही तो चल रहा है सब|" - वीणा सुनीता की बात का अर्थ समझी लेकिन उसे कोई महत्व न देते हुए उसने कहा|

    "यह तो वक्त काटने का तरीका है| मेरा मतलब तो दूसरा है|" - सुनीता ने जान-बूझकर आधी बात कही|

    "तुम जो कहना चाह रही हो, उसे समझ रही हूँ मैं| लेकिन यह नहीं हो सकता" - वीणा का उतर भी संकेत माञ ही था उसके मनोभावों का|

    "होने को क्या नहीं हो सकता?" - सुनीता ने फिर कहा|

    लेकिन जो तुम चाह रही हो, वह नहीं हो सकता....|" - वीणा के स्वर में कुछ कठोरता आ रही थी|

    "देखो, तुम अपना मूड नार्मल रखो| मैं तुमसे कुछ अनुचित कहकर मनवाना नहीं चाह रही| मैं तो अपने मनोभावों को प्रकट कर रही हूँ| तुम सुनो, समझ कर जवाब दो| अच्छा लगे तो हाँ कहना, बुरा लगे तो नकार दो| लेकिन मन को नार्मल रखो|"

    - सुनीता ने फिर एक कोशिश की|

    "मेरा मन नार्मल है| लेकिन तुमसे एक ही अनुरोध है कि क्रपा करके जो तुम्हारे मन में है उसे घुमा-फिरा कर मत कहो|" - वीणा ने स्वयं संयत स्वर में कहा|

    "अच्छा बाबा, लो सीधे शब्दों में पूछती हूँ वीणा तुम अपने परिवार की सोचो फिर से| अपना घर बसाने की सोचो।" - सुनीता के शब्द स्पष्ट थे इस बार|

    "वह तो है मेरा - मेरा अपना - मैं हूँ, मेरी यादें हैइसका सदस्य देव हर समय है साथ मेरे, बस|" - वीणा क्षण भर में भावुक हो गई - "इतना अच्छा, इतना छोटा परिवार और अब तो मेरे हर ओर रंगीन नजारे है| ढ़ेर-से बच्चे और ढ़ेर-सी उनकी खुशियाँ|" - इतनी भावुक हो गई कि रोने लगी|

    "वीणा! देखो न तुम कैसी पगली-सी बातें करती हो| मैं तो तुमसे जीवन की वास्तविकता की बात करना चाह रही थीऔर तुम फिर भावुकता की रौ में बहने लगी|" - सुनीता भी भावुक हो चली थी|

    "मेरा जीवन ही मेरी भावनाओं से बंधा है और तुम हो कि अच्छे चलते जीवन में रोक लगाना चाहती हो| चाहती हो एक नाम जो ओढ़ा है उसे उतार फेंक दूँ और दूसरा ओढ़ लूँ| वह बिगड जाए, फिर तीसरा| बस, यही वास्तविकता है तुम्हारी| यही जीवन है तुम्हारे शब्दों में?" - दोनों बहनें थी लेकिन सोचने का दायरा अलग-अगल था उनका|

    "वीणा! सच तो यही है कि यही वास्तविकता है| बिना पुरुष के नारी और बिना नारी के पुरुष अधूरा है|" - सुनीता के शब्द वीणा पर अपना असर नहीं डाल रहे थे|

    "यह बहुत पुरानी दकियानूसी बात है| कुछ नही रखा इस बंधन में| सबसे बडा बंधन है मन का| मन में बसे साथी से बडा कोई साथ नहीं| दुनियादारी सब दिखावा है| सब छलावा है मन का|" - वीणा भी आपनी सोच को, अपने मनोभावों को स्पषट रुप से व्यक्त कर रही थी|

    "छ्लावा नहीं कुछ भी मन का वीणा! समझो जरा| देव मिला था तुम्हें, तब भी तुम्हें तलाश थी एक पुरुष की| वह तुमने देव में देखा| वह पुरुष नही था सिर्फ तुम्हारे मन का छलावा था| छल लिया उसने तुम्हें| कैसे बंधी रहीं तुम उस नपुंसक के संग|" सुनीता तो आज जैसे ठान कर आई थी वीणा के मन में बैठी देव की याद को उतारने की|

    लेकिन वीणा इतना न सुन सकी, चीख-सी पड़ी - "बस करो, बस सुनीता! तुम हद से बढ़ रही हो|" - रोने लगी - "मेरे देव को इन बुरे शब्दों का हार न पहनाओ|"

    सुनीता ने बाहों में भर लिया उसे| वह भी रोने लगी| रोते-रोते ही बोली - "कह ले मुझे जो कुछ भी कहना चाहती है| आज मन की हर भड़ास निकाल दे तू! लेकिन मेरी बात सुन वीणा! यह सच्चाई है| जीवन की सच्चाई को समझ तू! देव की यादों का पल्लू बाँधे जिन्दगी काट नही सकती तू! देव जैसे कई और हैं| कोई और मिल जाएगा और देख लेना तब तू ही कहेगी जो हुआ अच्छा हुआ|"

    "मत कहो कुछ भी मुझे| तुम्हें पति-पत्नी के रिश्ते में केवल एक शारीरिक जरुरत दिखाई पड़ रही है| मुझे केवल एक प्यार दिखता है| मेरा देव मेरे जीवन से जुड़ गया है| मेरा देव मेरे साथ है| मैं अकेली नहीं|" - वह अपनी रुलाई पर नियन्ञण पाने की चेष्टा कर रही थी - "अकेली मैं तब पड़ जाती हूँ जब तुम लोग यह कहते हो कि मेरा देव अब नही रहा| मेरा देव अब मेरे साथ नही!" - भावनाओं की रौ में बह चुकी थी वीणा| देव की यादों से अलग नही होना चाहती थी वह|

    "तुम बहुत भावुक हो वीणा! वह भावुकता इतनी अधिक बढ़ गई है कि मुझे यह तुम्हारा पागलपन लगता है|" - सुनीता ने फिर कहा जो भावनाओं से बाहर निकालने की कोशिश करती जा रही थी|

    "चलो, मैं पागल सही| पर अच्छी हूँ| मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो| मेरा वक्त अच्छी तरह कट रह है| मेरा वक्त कट जाएगा| मेरे स्कूल में देखो! कितनी नन्स हैं! सभी अविवाहिता| क्या वे नही जीती अपना जीवन खुशी से?" और तब जैसे कुछ याद आया उसे बोली - "मैं तो सोच रही हूँ कितने दिनो से मैं भी नन ही बन जाउँ उन जैसे| सिस्टर रोजलीन तो मुझे सहर्ष अपने साथ रख लेगी|" सुनीता उसकी बात सुनकर डर गई जैसे| डर से ग्रस्त हुए बोली, "ना-ना वीणा! ऐसा मत करना| तुम जैसी हो वैसी ही ठीक हो| बस, इसके आगे कुछ मत सोचना| मैं तुमसे अब नहीं कहूँगी कभी, लेकिन नन बनकर जीने की बात मत करना तुम|"

    "डर गई....? कल क्या होगा यह तो समय ही बताएगा लेकिन अब यदि किसी ने दुबारा बात की तो यह पक्का है कि मैं होस्टल से कभी लौटकर नही आॐगी|" - वीणा का निर्णय सुनकर सुनीता भी डर गई|

    उसने वीणा को गले लगाया और उसकी पीठ सहलाते हुए बोली - "चल, चुप हो जा, वीणा! अब कभी ऐसी बात नही करुँगी| अब कभी नही कहूँगी तुझे| तु चुप हो जा| पगली है तू! तुझे बदल पाना मेरे बस में नही|"

    उधर कमरे के दरवाजे के पीछे खड़ी निर्मला की आँखें बहने लगीं अविरल| सिसकना चाह रही थी लेकिन रोक लिया उसने स्वयं को| उठकर पन्नालाल के पास चली आई| उनका कमरा दूर था वीणा के कमरे से| वहाँ पहुँच कर फूट पड़ी वह| पन्नालाल ने ऐसा देखा तो पूछा, "क्या हुआ, निर्मला?

    "पगला गई है वीणा.... क्या होगा इसका?"

    "सब ठीक होगा, मेरी बच्ची समझदार है| समय से सब ठीक हो जाएगा| तुम लोग उसे किसी बहस में न उलझाओ|" - पन्नालाल जैसे सब जानता था कि माँ निर्मला व सुनीता मन में क्या चाह रही है| वह न उनकी हाँ में था, न ही उनकी ना में| वह वीणा की इच्छा के साथ था|



    अगली बार अमित जब प्रिया से मिलने देहरादून आया तो निर्मला उसके सामने अपने मन का दुखड़ा ले बैठी| अमित समझता था उसके दुःख को| सोचता था, लेकिन उसे कोई रास्ता सुझाई न देता| देव को गुजरे सात महीने हो चले थे| सभी की दिनचर्या नियमित हो चली थी| दिल्ली में माँ क्रष्णा ही थीं जो हर आने वाले के सामने बैठकर देव को याद करके रोती थीं और यहाँ उसने देखा माँ निर्मला की भी यही दशा थी| उसका दुःख था - वीणा का भविष्य| वह वीणा के भविष्य की सोच हर दम रोती रहती थीं|

    "आज भी वह अपना दुःख अपने आप से ही बाँट रही हैं| क्या है उसके मन में मुझे नहीं मालूम| बस, जबसे होस्टल गई है सुबह से शाम तक मशीन के भाँति बच्चों में रमी रहती है| अपनी तो उसे न देव के रहते होश थी और न अब ही कुछ खबर है| उसका जीवन दूसरों के लिए ही बना है|" निर्मला का स्वर आँसूओं से भीगा था|

    अमित ने सुने उसके शब्द| मन वीणा के लिए कुछ करने को लालायित था| लेकिन करता क्या? यही बोला "क्या करुँ, मम्मी! मुझे तो कुछ समझ नही आता| मन में ढ़ेर-सी बातें आती है उनके लिए, लेकिन कुछ उपाय है नही मेरे पास|" - अमित धीरे-से यही कह सका| उसका स्वयं का मन तो दोनों ओर से दुविधा में घिरा था| वीणा का दुःख एक ओर और दूसरी ओर अपनी व प्रिया के एक हो जाने की चिन्ता| किसी अन्जान भय से हर समय उसका मन विचलित रहता था|

    "बेटा, ऐसा वातावरण तो है नही हमारे समाज का कि बेटी अकेली सारी जिन्दगी काट लेगी| कभी न कभी किसी न किसी सहारे की जरुरत पड़ती है| ऐसे में साल-दो-साल तो कट जाएँगे| लेकिन पूरे जिन्दगी पड़ी है अभी उसकी| कैसे काटेगी वह हर दिन? कोई तो सहारा होना चाहिए!" निर्मला को अमित से अपने मन की बात कहते हुए बहुत चैन मिल रहा था, बोलती जा रही थी, "अभी देखो उसकी सूरत देखकर लगता है जैसे कोई रोग लग गया हो उसे| बिल्कुल निचुड़-सी गई है| यह तो दिखावा है, अपने मन को झूठ का सहारा दिए है वीणा कि मुझे अब स्कूल के बच्चों में ही अपना जीवन दिखाई पड़ता है| मन में तो घुट-घुट कर ही जी रही है मेरी बच्ची|"

    - "वह तो मैं भी समझता हूँ, मम्मी कि भाभी आज नहीं तो कल बिल्कुल अकेली पड़ जाएगी| हम जिन पारिवारिक व सामाजिक परिस्थतियों में पले-बढ़े हैं, वहाँ स्वतन्ञ होकर अकेले जीने वाली लड़कियाँ गिनी-चुनी ही होती हैं और जो होती हैं वह ढ़ेर-सी कुंठाओं की शिकार हो जाती हैं|" अमित की बात सुन कर निर्मला को लगा कि वह जो कुछ भी कह रहा है उसकी सोच के ही अनुरुप है वह|

    - "बेटा, तुम कुछ करो उसके लिए|" - निर्मला ने कहा अमित से| मन यही कहता था उसका कि वीणा जैसे अमित की हर बात मान जाएगी|

    "मुझसे कहिए, क्या करना है? मैं तो भाभी के सुख के लिए सब करने को तैयार हूँ|" - अमित ने कहा| मन फिर किसी अग्यात आशंका से धड़का उसका, लेकिन ऐसी नही थी कोई बात|

    तब निर्मला ने कहा, "कोई लड़का ढूँढ़ों उसके लिए...|"

    "मैंने भी सोचा, लेकिन मेरे आस-पास कोई ऐसा नहीं जिससे बात कर सकूँ और फिर पहले भाभी के मन को भी तो टटोलना होगा|"

    "हाँ मैं जानती थी तुम यही कहोगे| उसके मन को टटोला था एक बार सुनीता ने| फिर इस बार मैंने। बहुत गुस्सा किया था उसने| लेकिन अब मैंने जब उससे कहा तो चुप रही| यह चुप्पी उसकी हाँ है यह तो मैं नहीं जानती पर बात को मैं आगे भी बढाने की हिम्मत नही कर पाई|"

    "हो सकता है जो गुस्सा उन्होने सुनीता दीदी से किया, वह आपके उपर प्रकट न कर सकी हो|" - अमित ने अपनी बात कही|

    तब निर्मला को लगा जैसे अमित को हर बात मालूम है| पूछा - "तुम्हें मालूम है इस बात का?"

    - हाँ, प्रिया ने लिखा था| हम तो कब से इसी बात पर विचार कर रहे हैं कि भाभी को हमें ही समझाना चाहिए, लेकिन डरते है उनके गुस्से से|" - अमित ने बताई निर्मला को अपने-प्रिया के बीच की बात|

    तब निर्मला ने कहा, "कितना बदल गई वीणा, पहले तो गुस्सा था ही नही उसके मन में| अब तो बात-बात पर भड़क उठती है या रोने लगती है| डर लगता है कुछ अधिक कह दिया तो कहीं घर आना ही बन्द न कर दे| इसी को ध्यान में रखकर मै इशारे से कुछ कहने की हिम्मत कर पाई और उसे चुप देखकर मेरी जुबान को तो ताला लग गया था|"

    निर्मला की बात सुनकर अमित ने कहा, "मैं समझता हूँ भाभी प्रेम से खुलकर बात कर सकती है| वह छुट्टी आएगा तो मैं उसी से कहूँगा भाभी को प्यार से समझाने को.....|"

    अमित की बात बीच में ही काट कर बोली निर्मला, "कहाँ बेटा| प्रेम और उसके डैडी एक ही मिट्टी के बने है| दोनों ही कहते है, वीणा की खुशी जिसमें होगी वैसा ही करेंगे| वह शादी करना चाहेगी तब भी हम उसके साथ है| वह शादी नही करना चाहेगी तब भी उसके साथ है| लेकिन कभी उस पर जबरदस्ती अपने विचार नहीं लादेंगे|"

    अमित के लिए यह बात नई थी| यह सुनकर वह बोला - "तब हिम्मत करके मैं ही बात करुँगा भाभी से| आप यदि इजाजत दें तो कल सुबह मैं और प्रिया उन्हें मसूरी में मिल लें?"

    "जरुर जाओ बेटा| कुछ हो जाए अच्छा वीणा का इससे बढकर और क्या खुशी होगी मेरे लिए!"

    माँ निर्मला ने अपनी स्वीक्रति दे दी| प्रिया कालेज से लौट आई| अमित को देखकर वह फूली न समाई| ह्रदय की धड़कन बढ जाती थी उसकी अमित को देखते ही|

    "कैसे हो?" - इतना ही पूछ पाई माँ के सामने वह उससे| तब निर्मला उठकर खाना बनाने रसोई में चली गई| अमित ने उठकर उसके गालों पर चुटकी काटी और कहा - "कल सुबह हम भाभी से मिलने मसूरी जा रहे है!"

    "हम कौन...?" - प्रिया ने अन्जान बनते हुए पूछा|

    "मै और तुम...!" - अमित ने मुस्कुराते हुए कहा|

    "मम्मी से पूछा....?" - पूछा प्रिया ने|

    "उन्होंने ही कहा है|" और तब अमित ने उसे धीरे से सारी बात बताई| और सब सुनकर प्रिया ने चुटकी ली - "सब बात तो समझआ गई लेकिन आखिर में अपने लिए मेरा साथ पाने का बहाना बड़ी चालाकी से तुमने तैयार कर लिया?" - पूछा प्रिया ने|

    "पागल हो मैं सीरियस हूँ|"

    "मैं कब कह रही हूँ तुम मजाक कर रहे हो!" प्रिया को अच्छा लग रहा था कि अमित मम्मी के कहे अनुसार वीणा को समझाना चाह रहा है और उससे भी अच्छा लग रहा था कि कल वह अमित के साथ अकेले मसूरी जाएगी| दीदी के साथ दो-तीन घंटे और शेष दिन उन दोनों के लिए था| उसे अमित का साथ बहुत अच्छा लगता था|



    मसूरी माल रोड़ से हट कर है कान्वेंट आफ जीजस एण्ड मेरी| लोग इसे वेवरली कान्वेंट कहते हैं| कारण इस छोटी-सी पहाड़ी को वेवरली-हिल के नाम से जाना जाता है| माल-रोड़ से एक दम सीधी चढ़ाई है| अमित को स्कूल तक कार ले जाने में घबराहट महसूस हो रही थी| तब दोनों ने निश्चय किया कि स्कूल तक पैदल ही चला जाए| कार माल-रोड़ के किनारे बनी पार्किग में खड़ी करके वह स्कूल की ओर चल दिये| माल से स्कूल की दूरी सिर्फ आधा किलोमीटर थी, पर एकदम सीधी चढ़ाई| एक-दूसरे का हाथ पकड़े पहले तो वे तेजी से चले| लेकिन तेज चलने से उनकी साँस जल्दी ही फूल गई| एक-दूसरे का हाथ छोड़ वह अपनी साँस को नियन्ञित करने में लग गए| कुछ देर उन्हें रुकना पडा। साथ-साथ खड़े दोनो को आपनी और एक-दूसरे की साँसों की आवाज सुनाई दे रही थी|

    घाटी में दूर-दूर तक हरियाली फैली थी| उससे आगे नभ छूती गगन चूमती पहाड़ियाँ| साँस संभली तो हाथ फिर मिल गए| साथ-साथ दोनों आगे बढने लगे| "धीरे-धीरे चलो, कदम-से-कदम मिलाकर| साँस काबू में रहेगी|" - कहा अमित ने प्रिया से|

    स्कूल पहुँचे उस समय दो बज रहे थे दोपहर के| वीणा डारमैटरी में थी| चपरासी ने जब खबर दी तो भागी चली आई| दोनों को देखकर एकाएक खिल-सी उठी| "वट ए प्लैजेंट सरप्राईज!" - वीणा खुशी से प्रिया से लिपट गई| फिर बड़े प्रेम से अमित से मिली| दोनों हाथ थामें उसके बोली, "तुम कब आए?"

    "कल ही!" - अमित ने मुस्कुरा कर उतर दिया|

    "चलो बाहर रेस्तरां में चलते है! छोटा-सा है मगर काम चल जाता है|" - वीणा उन्हें लिए बाहर की ओर बढ गई| स्कूल के गेट के बाहर ही एक छोटा-सा रेस्तरां था| खाने-पीने की सब चीजें| शायद बच्चो की जरुरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया था| अभिभावक जब भी आते होंगे बच्चों के तो यहीं बैठकर अपना मन बहला लेते होंगे|

    चाय पीते हुए इधर-उधर की बातें होती रहीं| अमित शब्द जुटा रहा था| शब्दों के साथ-साथ हिम्मत भी जुटा रहा था| कैसे कहे वह वीणा से| आखिर हिम्मत जुटाई उसने और कहा, "यहाँ कैसा लगता है भाभी?"

    "अच्छा लगता है| समय कट जाता है| कब सुबह से शाम होती है पता ही नही चलता| रात जल्दी सोना नही हो पाता तो देर रात तक कोई-न-कोई किताब पढ लेती हूँ|" वीणा ने सहज भाव से उतर दिया| लेकिन अपनी बात कहने के बाद उसे एकाएक लगा जैसे अमित के छोटे-से प्रश्न के उतर में जो शब्द कहे है वे सब सच तो नहीं! न तो वह कोई किताब पढती थी, न अब पढती है| अमित को इस बात का पता था| वह जरुर पढता था तभी एक दिन जब देर रात गए तक वीणा को नींद नही आ रही थी तो उसने उसे एक उपन्यास दिया था और कहा था, इसे पढ लो, भाभी! रात कट जाएगी और पढते-पढते नींद भी आ जाएगी|"

    उस पर वीणा ने कहा था, "ना, बाबा, ना! मै उपन्यास देखकर ही बोर हो जाती हूँ| उससे बेहतर है खुली छत पर बैठकर तारे गिनना|" - तब तारे गिनती थी| और अब किताब पढती है| अमित ने पूछ लिया - "यह आदत कब से पडी| आप तो बोर हो जाती थीं किताबों से?"

    लेकिन वीणा ने स्वतः ही अपने शब्द बदल दिये, "वह तो मैं यूँ ही कह गई| मैं अब भी तारे गिनती रहती हूँ|"

    "यहाँ आप तारे गिनती हो - वहाँ मम्मी रात के अंधेरे में कोई चिराग ढूँढती रहती है| डैडी मन ही मन कुछ सोचते रहते है| सब और खामोशी छाई हुई है| आपने तो सबसे अलग आकर स्वयं को समझा लिया है लेकिन सब बडे आपके या हम छोटे आपसे आगे कुछ नहीं सोच पा रहे|"

    - अमित के शब्दों ने वीणा को भी गम्भीर बना दिया|

    "मै तो चाहती हूँ सब खुश रहें| सब अपने को दूसरे कामों में व्यस्त रखें| वक्त यूँ ही कट जाएगा|" - वीणा की सोच उदास हो गई थी|

    "जीवन वक्त काटने के लिए तो नहीं मिला| जीवन तो जीने के लिए मिला है| हमें आगे नए रास्ते की खोज में लगे रहने को मिला है| ऐसे में आपको यूँ विरक्त देखकर हम आपके विषय में सोचने के सिवा क्या कर सकते है?"

    - अमित नपे-तुले शब्दों का प्रयोग कर रहा था| वीणा अब चुप थी| अमित ने फिर कहा, "भाभी! मैं कुछ कहना चाहता हूँ आपसे| आप वायदा करो, गुस्सा नहीं करोगी| मेरे बात का बुरा नहीं मानोगी|"

    वीणा समझ गई कि अमित आगे क्या कहना चाहता है| इतना ही बोली, "तुम्हारी बात सदा सुनी है, अमित तुम जो कहना चाहते हो कहो, मैं सुन रही हूँ|"

    तब अमित ने हिम्मत जुटाई। सीधे शब्दों का प्रयोग करते हुए बोला, भाभी! कुछ बाते होती है जो हमें सिर्फ अपने लिए नही करनी होती| दुसरों के मन को देखकर निर्णय लेना होता है| आप आज जिस मनःस्थिति के दौर से गुजर रही है, वह हम सब समझते है| आपके जीवन में पिछले दिनों जो उतार-चढाव आए वे हम सबने देखे है। समझते है आपके मनोभावों को| आप जो कुछ भी चाह रही थी, वैसा ही सबने साथ दिया| आप जैसा कोई विरला होगा जो अपना दायित्व इतनी बखूबी से निभा सकेगा| अब आप जिस तरह सबसे कट कर यहाँ स्कूल में स्वयं को व्यस्त किए हो, यह बात किसी को रास नहीं आ रही| मेरी या किसी और की बात होती तो, शायद आपको सोचने को कोई विवश नही करता| आज बात है एक पूरे परिवार की और उससे उपर माँ की| माँ के साथ-साथ डैडी की| वे दोनो अपने ही तरीके से हर दम आपकी सोचते रहते है| डैडी को तो आप जानती है, वे अपने मन की बात किसी को नही कहते| लेकिन मम्मी तो सदा आपकी सोचती रहती है और दिन भर रोती है| सिर दर्द से फटता है लेकिन चैन नहीं पातीं|" - अमित की भूमिका बहुत लम्बी हो चली थी|

    लेकिन सीधे मुद्दे की बात करने में उसे समय लग रहा था| एकाएक अमित ने शब्दों की राह बदली और कहने लगा, "भाभी| जिन्दगी को नए सिरे से शुरु करो| यहाँ स्कूल में कुछ नहीं होगा| परिवार की सोचो| देव की यादों के सहारे कुछ नहीं होगा| उसमें दर्द के सिवा कुछ नही| यह जीवन चलने के लिए है| रुककर बैठने के लिए नही|"

    अमित चुप होकर वीणा को देखने लगा| प्रिया भी एक टक बोले जा रहे अमित को ही देखे जा रही थी| अमित चुप हुआ तो वीणा की ओर देखने लगा| उस पर अमित के शब्दों की हुई प्रतिक्रिया जानने को बेचैन थी|

    वीणा सुनीता को तो बहुत कह चुकी थी| माँ की सुनकर चुप रही थी| आज अमित के मुँह से वही बात सुनकर भी एकाएक कुछ न बोल पाई| सोचती रह गई| अमित को लगा कि वीणा के मानस-पटल पर उसके शब्द अपना प्रभाव डाल रहे है| वह फिर बोलने लगा - "आप अकेली जरुर जिन्दगी काट लेगी| लेकिन इस बन्द दायरे में| मम्मी-डैडी बूढे हो चले हैं| सब भाई-बहनों का घर बस जाएगा| आगे-पीछे आप अकेली रह जाएगी| लेकिन किसके लिए? अपने बीते दिनों की परछाइयों के लिए? बेहतर नही होगा, कोई साथी मिले और आपका अपना परिवार हो?" -- प्रश्न कर लिया अमित ने|

    वीणा तब उसे ही निहार रही थी| एकाएक बोली, "अमित, सब मुझे नया रास्ता सुझा रहे है| आखिर क्यों? मैं जिस रास्ते पर चल पड़ी हूँ, उसमें कमी क्यों दिख रही सभी को? क्या सभी परिवार बसा कर ही जीते हैं? और जो परिवार बसा कर भी जीते है, क्या वही खुश रहते है? क्या मैं ऐसे ही खुश नही रह सकती? और इसकी क्या गारंटी है की मैं फिर से परिवार बसा लूँगी तो खुश ही रहूँगी?"

    - एक साथ प्रश्नों की झडी लगा दी थी वीणा ने|

    अमित ने कुछ सोचा फिर कहने लगा, "कोई कमी नही जिस रास्ते पर आप चल रही है उसमें| लेकिन क्या यह सच नही की यह रास्ता आपकी अपनी इच्छाओं को दबा रहा है| मेरी भाभी ने कभी क्या सोचा था अकेले जीवन बसर करने का? क्या कभी भी यह कल्पना की थी कि आप अकेली, इन नन्स की तरह जीवन बिताएँगी? आपने तो सदा एक परिवार की कल्पना की थी| और फिर सदा आपकी क्या इच्छा रही? आप, आपका परिवार, आपके भाई-बहन, आपके माता-पिता सभी प्रसन्न रहे? और ऐसे में एक बार यदि चोट लग गई है तो यही चोट बार-बार लगने की आशंका से पैर पीछे हटा लिए जाएँ? क्या यही बेहतर है?"

    बात बदल कर वीणा ने कहा अमित से, "तुम अपने भाई को भूल सकते हो?"

    "नहीं बिल्कुल नहीं भूल सकता|" अमित जैसे तैयार था|

    "तब मैं उसे कैसे भूल जाउँ......?"

    ""देखिए भाभी, न तो मैं भूल सकता हूँ, न आप| कोई भी अपने बीते दिन नही भूल सकता और न ही भूल पाता है| लेकिन यही जीवन है| जीवन में रोज कुछ नया होता है और ऐसे में जीवन को रोका नही जा सकता! हाँ, देव के साथ दस-बीस वर्ष बिताए होते आपने| कोई यादें छोड़ गया होता, आपका परिवार होता, बच्चे होते उन्ही के संग जीवन बीत जाता| यहाँ तो हाथों की मेंहन्दी भी नही उतरी और आपके सपने टूट गए| ऐसे में क्या एक और कोशिश गलत है अपना सिर्फ अपना परिवार बनाने की?"

    तब वीणा बहुत देर तक चुप रही| सोचती रही| वास्तव में अकेलापन था वीणा का जो उसको काट रहा था| नए सिरे से जिन्दगी जीना चाह रही थी वह| वह नया सिरा, वह नई राह उसने ढूँढी थी इस स्कूल की चारदिवारी में| और उसके सभी शुभचिन्तक उसे दूसरे रास्ते को चुनने को कह रहे थे| नए सिरे से इस जिन्दगी में चुप्पी तो रहेगी और दूसरे रास्ते पर खुशी लौट सकती है? ऐसे में सोचने लगी कि क्या उचित है उसके लिए? एक अवसर फिर से भाग्य को दे वह? ऐसे में अपने बूढे होते माँ-बाप का चिन्ताकुल चेहरा उसके मानस-पटल पर छा गया|

    सोचने लगी थी वीणा कि आस-पास का हर साथी एक ही बात से चिन्तित है| एक ही बात, वीणा अकेली है! वह अकेली कैसी जिएगी? यहाँ स्कूल में भी तो यही हो रहा था कोई भी मिलता था, यही पूछता कि वह शादी-शुदा है। हां ' कहती तो सारी कहानी सुनानी पड़ती| दया ही वापसी में मिलती| शब्दों की दया का पाञ बनकर रह गई थी वह| और यदि चुप रहती तो आने वाला कोई न कोई रिश्ता बता जाता| यह बात तो वह अमित को नहीं बता पाई थी|

    सच यह भी था कि कान्वेंट के होस्टल में बच्चों के बीच कहीं अपनी बच्ची को दौड़ते देखने की कल्पना में वह घंटो शाम को स्कूल के ग्राउण्ड में बैठी रहती| कभी-कभी हँस देती थी अपनी कल्पना में| कभी अक्सर रोने से ही उसका मन हल्का हो पाता था| कहने को बिन शादी, बिन बच्चे बहुत जीती है| स्कूल में भी कितनी नन्स थी ऐसी| लेकिन वह न तो ऐसे परिवेश में पली-बड़ी थी और न ही उसका कभी ऐसा सपना था| एक भली औरत अपने लिए सुन्दर परिवार, सुन्दर पति, सुन्दर बच्चो की कल्पना करती है जो कालेज से उसने भी की थी| और उसका सपना साकार भी हुआ था - लेकिन ऐसा कि जो आँख खुलते ही टूट गया| वह अकेली रह गई| सिर्फ ससुराल है, इसके सहारे तो एक विधवा का जीवन नहीं जी सकती| हाँ, बच्चे होते तो उनके लिए जी लेती| वह तो कुछ नही देकर गया| न बच्चे और न ही कोई ऐसी यादें जिनके सहारे वह जी लेती| बहुत अन्तर्मुखी, अपने गम को पी कर रहने वाली| लेकिन एक भीतर कहीं दबी चाह थी, जो सब उसे उपर लाकर बिठा गए| सुबह से शाम, रात ढलने पर भी जो कोई आता, एक ही वाक्य कहता, 'वीणा, बिना शादी किए कैसे रहोगी? सारी जिन्दगी तो पड़ी है, कैसे काटोगी?'

    - और वीणा कोई असाधारण जीवात्मा तो न थी - जो सिर्फ साध्वी का चोला पहन कर जी लेती! देव के इतने मीठे सपने भी न थे उसके पास| नए सपने, नई दुनिया, नए चेहरे की तलाश उसके अन्तर्मन से उपर उभर कर आ गई और उसने चुप्पी को तोड कर अमित-प्रिया से कह दिया एक ही शब्द - "जो माँ कहें वही करो| मैं अब कभी अपनी बात नहीं कहूँगी|"

    एक पल तो अमित को लगा था कि उसने स्वयं को निर्जीव करार दिया है ऐसा कहकर| दूसरों को इतना चिन्तित देखकर, कहीं वीणा ने यही तो नही सोच लिया कि उसके शादी करने से कम-से-कम यह रोज-रोज का लफड़ा खत्म हो जाएगा| जीवन की धुरी आगे की ओर बढना तो शुरु कर देगी| व्यर्थ में सब रुक गया है| वह कम-से-कम जी तो पाएगी अपनी तरह से| एक समझोता मान कर ब्याह कर ले फिर से| जो अब हुआ है, देव के जाने पर, उससे बडा दुःख तो और कोई नहीं होगा| अच्छा ही होगा शायद या फिर दुःख भी हुआ तो सह लेगी उसे| बडे-से-बडा दुःख सहने की क्षमता तो दे ही गया है देव उसे|