• Chapter 31   Nayi Subah

  • देर से सो कर उठी प्रिया| अमित कब का उठ चुका था| अरुण के साथ सुबह की सैर करने चला गया था| वीणा तब तक अपने किचन का काम निपटा चुकी थी| सुबह की चाय पीते समय वीणा ने उसे बताया कि उनकी दिनचर्या सुबह पाँच बजे शुरु हो जाती है| सात बजे तक सुबह का नाश्ता व दिन भर का खाना तैयार करके, वह बच्चों के साथ-साथ ही काम पर निकल जाती है| बच्चे चार बजे स्कूल से लौटते हैं और वह पाँच बजे आफिस से घर आती है| अरुण पीछे से ज्यादातर घर ही रहता है| सप्ताह में एक-आध बार ही उसे बाहर जाना होता है| शेष जो कुछ भी काम है वह टेलीफोन के सहारे ही करता है|

    प्रिया अरुण की कहानी सुनने को इतनी उत्सुक न थी उसे तो अपनी बहन के पन्द्रह वर्षो का हिसाब जानने की उत्सुकता थी| उसने देखा, वीणा जैसे रात वाली वीणा नहीं| अब काफी तरोताजा लग रही है| रात को वह अपनी प्रिय बहन से मिलकर भावनाओं के आवेग के सामने बंधी दिख रही थी| अब वीणा जैसे उस आवेग से बाहर आ चुकी है| ऐसे में प्रिया ने सीधे शब्दों का प्रयोग करते हुए वीणा से कहा, "दीदी! जीजाजी के साथ कोई कष्ट तो नहीं आपको?"

    "कष्ट! कष्ट कैसा? इतना समय बीत गया| मैं और अरुण एक-दूसरे को अब पूरी तरह से पहचान चुके हैं| बच्चे हैं, मैं उन्ही के साथ व्यस्त रहती हूँ|" - वीणा ने सहज भाव से उतर दिया|

    "नहीं-नहीं, मेरा मतलब हैं आपको जिन्दगी के इन पन्द्रह वर्षो में कैसा लगा?" - प्रिया ने दूसरे शब्द प्रयोग किए| वह अपनी बहन के बीते दिनों को जानना चाह रही थी|

    वीणा ने तब कहना शुरु किया, "प्रिया! जीवन की सार्थकता तो उसी में है कि जो हो रहा होता है हमारे साथ, यदि हम उसमें सुख ही खोंजे, सुख ही देखें - तो कुछ भी बुरा नही लगता| यही मेरी आदत है शुरु से| मैं तो अपने बीते दिनों से कुछ सीखने के किए कभी-कभार याद कर लेती हूँ उन्हें| और अब मेरा एक पूरा परिवार बन गया है| बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते जा रहे है मुझे यही लगने लगा है कि मैने अब सब सुख भोग लिए हैं| अरुण से शादी के एकदम बाद पूछ लेता यदि कोई तो शायद कह देती, पहले ही अच्छा था| शादी न करती तो भी अच्छा था| लेकिन शिखा के आते ही मैं सब भूल गई| अरुण की निजी आदतें कैसी भी हो, उसने मेरे परिवार को सुखी रखने के लिए सब सहयोग दिया है| एक के बाद एक, इन तीनों बच्चों के आने के बाद तो मुझे अपने आगे-पीछे औ