• Chapter 4   Nayi Subah

  • नई सुबह से पहले

    वह पाँच थे कुल - एक महिला और चार पुरुष| प्रेम उन्हें लेकर बस स्टैण्ड से जब घर आया तो वीणा पिछले कमरे की खिड़की के पास खड़ी उन्हे देख रही थी|

    "कौन होगा इनमें से, सभी सुन्दर है|" - मन ही मन सोचा वीणा ने| देख रही थी - दो भरे हुए बदन के थे| एक बिल्कुल दुबला-पतला था, एक मध्यम आकार का| कद सभी का छः फुट के आस-पास था| "कौन सा हो सकता है ?" - सुनीता कब से आ खड़ी थी उसके पीछे वीणा को पता भी न चला था| चुटकी-ली उसने वीणा की तभी मालूम पड़ा और वह लजा गई, जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो| सुनीता दो वर्ष बड़ी थी वीणा से| दोनों एक दूसरे की हमराज थीं| इसीलिए उसके मन की बात समझ कर बोली, "सब एक जैसे हैं| कोई भी हो ठीक है| हाँ वह नीले कोट वाला सबसे अच्छा है|""हो सकता है" - वीणा ने कहा| "अच्छा है, लेकिन मुझे तो वह दुबला-पतला लगता है तुम्हारा उम्मीदवार|" - सुनीता ने फिर उसकी चुटकी लेते हुए कहा, "अब तैयार हो जाओ जल्दी से| अभी भीतर जाना होगा तुम्हें अपना परिचय देने|""हाँ, हो जाती हूँ| कौन सा अभी जाना है| दिन भर का प्रोग्राम होगा उनका| दिल्ली से आए हैं| थोड़ा आराम करेंगे| खाना खाएँगे| तब जाकर मेरा नम्बर आएगा|" वीणा अपनी कल्पना में डूबी कह रही थी| खुशहो गई थी आने वालों की सूरतें देखकर| पहले एक कोने में मन के डर था कि विग्यापनों के माध्यम से होने वाले रिश्ते सुनने में कुछ और, और दिखने में कुछ और लगते हैं| इन्हें देखकर ही वह आश्वस्त हो गई कि जैसा सोचा था, वैसे ही लग रहे हैं|

    "नीले कोट वाला ही होगा, देव, - डाक्टर देव कुमार|" मन ने जैसे उसके निर्णय दे दिया|

    लगभग पाँच मिनट बाद कमरे में रजनी ने प्रवेश किया और बोली - "अरे वीणा, वो नीले कोट वाला है देव| बाकी दो उसके भाई हैं और एक दोस्त| और वह औरत उसकी भाभी है|" बहुत उत्साहित थी वह| शायद सबसे पहले उसका ही परिचय हुआ हो जैसे| फिर कुछ ठहरकर बोली "चल तैयार हो जा| मम्मी कह रही है चाय तुम्हें ही ले जानी है भीतर|"

    तभी कमरे में गीता भी आ गई| सबसे छोटी बहन गीता लाडली घर की। अक्सर आधुनिक परिधान में रहने वाली। बाल भी छोटे-छोटे। बाय कट।आते ही बोली - "बड़े मजे आए दीदी| मैं पानी लेकर गई तो उनमें कुछ खुसर-फुसर हुई| शायद समझ रहे हैं कि तुम भी मेरे जैसी होगी| मजे आएँगे दीदी, यदि तुम भी जीन्स पहनकर उनके सामने जाओ|"

    "चल-हट! मैं अपना मजाक नहीं बनवा सकती| अब तू बाहर जा और उनकी सेवा कर| मुझे तैयार होने दे|" - वीणा को सबकी बातें बहुत अच्छी लग रही थीं| लेकिन मनचाही खुशी पाकर वह चहक नहीं पा रही थी बस शर्म से लाल हुए जा रही थी| सबके सामने जाने में उसे बड़ी शर्म आ रही थी| अपनी शर्म, अपनी खुशी छिपाने का प्रयत्न करते हुए उसने गीता को बाहर भगाना चाहा| लेकिन गीता भी भला कहाँ यूँ ही जाने वाली थी बोली, "वाह! दीदी| अभी से | - अभी तो बात भी नहीं हुई तो इतना ध्यान, बाद में क्या होगा ?" और फिर गीता वहाँ रुकी नहीं, क्योंकि जानती थी रुकी तो दीदी कान खींचेगी| भाग गई रसोई घर की ओर जहाँ मेहमानों के लिए चाय तैयार हो रही थी|

    दिल्ली सेआए थे, देव, देव के बड़े भाई कमाण्डर रमेश कुमार, उनकी पत्नी मालती, मिञ प्रमोद व छोटा भाई अमित| ड्राईग रुम में सभी बैठे इसी व्यग्रता से भीतर से आने वाले को देखे जा रहे थे कि शायद वीणा ही आ रही है| लेकिन कभी रजनी आती थी, जिसका परिचय प्रेम के बाद उनसे हुआ था| गीता ने तो अपना परिचय स्वयं दे दिया था| पानी लेकर भीतर आई तब वे सब लोग ड्राईग रुम में अकेले थे| प्रेम मम्मी के पास रसोई में चला गया था| उसी ने अभिवादन करने के साथ ही स्वयं बता दिया कि वह सबसे छोटी है घर में| गीता है नाम उसका| बी एस सी के पहले साल में पढ़ रही है|

    गीता ने महसूस किया कि आगन्तुकों में से एक ने उस दुबले लड़के कि तरफ मुस्कुरा कर देखा था| गीता का परिचय जानकर| गीता को भी रमेश ने सबका परिचय दिया|

    प्रेम लौटकर कमरे में जब वापिस आया तब गीता भीतर भागी सबको खबर देने| घर भर में चहल-पहल मची हुईथी| पन्नालाल अभी घर नहीं पहुँचे थे| बाजार गए थे| मेहमानों के लिए कुछ खाने-पीने का सामान लेने| निर्मला को उन्हीं के आने की प्रतीक्षाथी| लड़की के रिश्ते के लिए आए लोगों को देखकर उसके पैरों में उथल-पुथल मच जाती थी| कुछ काम नहीं कर पा रही थी| बस बदहवास-सी रसोईघर में चीजें इधर-उधर रखे जा रही थी| ऐसे में रजनी और गीता ने कमान सँभाल ली थी और साथ ही पड़ोस से थापा आँटी चली आई थी| कुछ काम में हाथ बँटाने और कुछ घर की खबर लेने|

    यह रिश्ता ढूँढ़ा था रमेश कुमार ने| देव तो विरक्त हो चुका था| शादी करने की सोचता था, लेकिन एक डर जो बैठ गया था उसके मन में उसे महसूस कर वह अपनी शादी की इच्छा को मन में दबा लेता था| रमेश छुट्टी आया| उसी ने पहल की| देव से खुलकर बात की| तब देव ने अपने मन की उलझन उसे प्रकट कर दी| रमेश से कुछ न छिपा था| वह जानता था अपने भाई के मन में बैठे डर को| यही बोला वह तब, "दो साल हो गए हैं, आपरेशन को| उसके बाद तुम्हें कुछ परेशानी नहीं हुई| सेहत तुम्हारी पहले से अच्छी हो गई है| अच्छा खाते हो, अच्छा कमाते हो| रिश्तेदारी में लोग रिश्ता तो अब भी ला रहे हैं| यह अलग बात है कि लड़की वही सौंपने कि बात करते हैं जिसमें कुछ न कुछकमी हो| ऐसे में क्या वे सब नहीं सोचते कि इस लड़के का आपरेशन हुआ है ? यह बहुत बीमार था| - और आपरेशन होना कोई बड़ी बात नहीं अब| लड़की अच्छी मिले यही इच्छा है और इसीलिए सोचता हूँ अखबार में विग्यापन दे दिया जाए|"

    देव को सम्बल मिला रमेश कुमार की बातों से| वह अकेला नहीं है| कोई और भी चिन्ता करता है उसकी| मन में बैठी प्रबल इच्छा, चाहे कैसी भी हो, कोई पूरा करने में सहयोग देने की बात कहे तो वही सबसे अच्छा लगता है| तब लगता है मन को कि दुनियाँ में उस व्यकित से बढ़कर उसका कोई हितैषी नहीं हो सकता| ऐसे में मन की इच्छाऔर प्रबल हो जाती है, पूरा होने को| मन सब कपाट बन्द कर देता है| मन और कुछ सोचना बन्द कर देता है| बस जो सोचा है, वह पूरा हो जाए|

    ऐसे में देव ने यही कहा, "विग्यापन में आपरेशन के बारे में जरुर लिखना है और एक बार जाकर डाक्टर गुप्ता से जरुर मिलना चाहिए हमें कुछ भी अन्तिम निर्णय लेने से पहले|"

    इस पर रमेश ने कहा, "वह तो मैं भी सोच रहा था| अभी विग्यापन देते हैं और फिर किसी दिन तय करने से पहले हम दोनों जाकर डाक्टर से भी मिल लेंगे|" फिर कुछ सोच कर बोले, "ऐसा करो तुम ही विग्यापन का मैटर बना दो| मैं भेज दूँगा अमित के हाथ|"

    "ठीक है, बना दूँगा| अमित, तुम कल ही अखबार में दे आना|" - देव ने कहा तब|

    बस फिर क्या था विग्यापन दे दिया अखबार में और अगले ही दिन डाक्टर गुप्ता से मिलने दोनों भाई उनके क्लिनिक जा पहुँचे|

    दो वर्ष बाद देव को देखकर डाक्टर गुप्ता बहुत खुश हुए|

    "स्वागत है, डाक्टर कपूर! बहुत अच्छा लगा तुम्हें देखकर कोई परेशानी तो नहीं है न ?" - डाक्टर गुप्ता क्या सभी डाक्टर अपने मरीज को एकाएक सामने देखकर यही प्रश्न करते हैं| डाक्टरों के पास कोई स्वस्थ व्यकित तो जाता नही और देव से उन्हें विशेष लगाव भी हो गया था उसके इलाज के समय|

    "आपके सामने खड़ा हूँ| देख लीजिए, आपने मेरी काया ही पलट दी है" - देव ने मुस्कुराते हुए डाक्टर गुप्ता से हाथ मिलाया|

    "यह सब तुम्हारी अपनी विल-पावर से हुआ है| जितना व्यकित पाजिटिव होता है, उतनी ही जल्दी ठीक हो जाता है|" - देव की जीवन के प्रति उमंग से पूर्णतः परिचित थे डाक्टर गुप्ता| आपरेशन तो वह रोज ही करते थे, लेकिन देव जैसे मरीजों से कभी-कभी मुलाकात होती है, तभी वह उसे बिल्कुल नहीं भूले थे|

    डाक्टर गुप्ता तब रमेश की ओर हाथबढ़ाते हुए बोले, "यदि मैं गल्ती नहीं कर रहा तो आप देव के बढ़े भाई हैं, कमाण्डर रमेश कुमार!"

    "जी डाक्टर! बहुत अच्छा लग रहा है आप हमें भूले नहीं| न अपने मरीज को और न ही उसके परिवार को!" - रमेश डाक्टर गुप्ता कि स्म्रति को देखकर हतप्रभ हो गया था|

    "देव जैसे व्यकित कभी-कभी डाक्टर की जिन्दगी में आते हैं| इसका इलाज करके मुझे भी बहुत अच्छा लगा| इसे ठीक देखकर मुझे भी बहुत खुशी होती है|" - यह कहकर डाक्टर गुप्ता ने देव से पूछा, "कहो देव, कैसे आना हुआ ? कोई परेशाने तो नहीं ?"

    "नहीं डाक्टर ! मैं बिल्कुल ठीक हूँ|" देव ने कहा ओर रमेश की ओर देखा| जैसे कहना चाह रहा हो कि आगे बात वही करें|

    तब रमेश कुमार ने कहा - "हम आपकी राय लेने आए हैं डाक्टर| याद है अपने मुझसे कहा था कि आपरेशन के एक साल बाद कोई परेशानी न हुई तो देव बिल्कुल हमारे जैसा ही होगा|" "हाँ-हाँ सब याद है, लेकिन इसमें कोई खास बात है ?"

    "हाँ डाक्टर| मैं आप से राय लेना चाहता हूँ कि क्या हमें देव कि शादी के लिए कही बात चलानी चाहिए?"

    "ओह! तो यह बात है|" डाक्टर गुप्ता जैसे भीतर ही भीतर कुछ सोचने लगे| कहीं गहरे में उतर कर| लेकिन उपर से उन्होंने अपनी मुस्कुराहट जारी रखी| तब सरल भाव से पूछा उन्होंने - "क्यों कोई पसन्द है या किसी को तुम पसन्द हो ?" - बात डाक्टर गुप्ता ने देव को कही, जवाब रमेश ने दिया|

    _ "हाँ, बात चल रही है, लेकिन आपकी राय लेना जरुरी समझता हूँ|"

    "भई! इसमें मेरी राय की क्या बात! पसन्द है जरुर करो| लेकिन सब बात बताकर| आखिर कुछ तो है जिसे छिपाना उचित नहीं ओर सबसे उपर लड़की का समझदार, सहनशील होना बहुत जरुरी है| क्योंकि बिमारी का क्या कहना, कभी कुछ ना होते हुए भी आ घेरती है| और देव के केस में पहले क्या था? आखिरी दम तक इलाज तो बवासीर काहो रहा था और अन्त में निकला क्या-------?" - बात अधूरी छोड़ दी डाक्टर गुप्ताने| वे सब वास्तविक स्थिति से तो परिचित थे|

    "वह तो हम समझते है, डाक्टर| यानी आपकी तरफ से कोई परेशानी नहीं है? - रमेश ने पूछा|

    "अब तक की प्रोग्रैस तो यही कहती है कि देव अब तन्दुरुस्तरहेगा| शेष कब क्या हो, कोई नहीं जानता|"

    _ फिर कुछ रुक कर कहा - "मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं, देव शादी में मुझे जरुर बुलाना!"

    डाक्टर निजी बातों के लिए शायद इससे अधिक समय नहीं दे सकता था| इसके लिए यह इशारा काफी था| देव व रमेश कुमार ने भी बारी-बारी हाथ मिला कर उनसे विदा ली|

    बाहर निकलते हुए डाक्टर गुप्ता को लगा कि आते हुए देव काचेहरा जितना चुप-चुप था जाते हुए उतना ही खिल सा गया है| शायद अपनी शादी की बात सुनकर| इससे अधिक नहीं सोचा डाक्टर गुप्ता ने| इंटरकाम का बटन दबाकर नर्स को दूसरा मरीज भेजने को कह दिया| और स्वयं सामने पड़े कागज को देखने में तल्लीन हो गए|