• Chapter 5   Nayi Subah

  • वीणा देख रही थी विग्याप| अखबार में| अलग कमरे में बैठ कर देखती थी| इसलिए नही कि शादी केबिना उसे अब अच्छा नही लगता था| बल्कि इसलिए कि वह अपने माता-पिता की चिन्ता मिटाना चाहती थी| छोटी बहन रजनी का रिश्ता पक्का हो चुका था| घर वाले चाह कर भी रिश्ता न ठुकरा सके| पाँच बेटियाँ थी| एक सुनीता का विवाह ही हुआ था| उम्र में दो वर्ष का अन्तर था सबके लेकिन वीणा थी कि उसे कोई पसन्द नहीं आता था| कहीं न कहीं उसे कोई कमी खटक जाती थी और इसीलिए वह 'हाँ' नही कहती थी| निर्मला भी तंग आ चुकी थी| आखिर हर माँ की चाहत होती है कि वह अपनी पुञी के लिए अच्छे से अच्छा वर तलाश करे| लेकिन वीणा के मामले में उसे लगने लगा था कि उसकी पसन्द कदापि भी वीणा कि पसन्द नही हो सकती| ऐसे में वीणा कि मानकर उन्होंने रजनी के रिश्ते वालो से यही वायदा लिया था कि शादी पहले वीणा की करेंगे बस जैसे भी हो उन्हें साल-छः महीने प्रतीक्षा करनी पड़ेगी| लड़के की पसन्द थी रजनी| सबने 'हाँ' कर दी| ऐसे में माँ को वीणा की चिन्ता सताए रहती थी इसीलिए उसने एक दिन वीणा को कह दिया था, गुस्से में, खीजते हुए - "तुम्हारे लिए तुम्हारा सपनो का राजकुमारतो अब ढूँढ़ना मुझे टेढ़ी खीर लगता है| स्वयँ ढूँढ़ कर बताओ तब मानूँ|" इस पर वीणा कुछ बोली न थी| मन ही मन उसने कुछ ठान लिया था| इसी कापरिणाम था कि हर शनिवार को वह अखबार में वैवाहिक कालम को ध्यान से देखती और स्वयं अपने पिता की तरफ से पञ लिख देती थी|

    उस दिन भी वह देख रही थी विग्यापन और ऐसे में ही एक विग्यापन पर उसकी द्रष्टि पड़ी लिखा था - "Match for Ph.D. 32, 175 cms. Lecturer in Delhi University operated for Sigmoid Clostomy Simple Early Marriage, Reply Box………" वीणा ने महसूस किया कि वर अच्छा है| उसकी स्वयं की उम्र 28 थी| चार वर्ष का अन्तर तो कोई अधिक नहीं होता और आपरेशन की बात उसे कुछ महत्वपूर्ण नहीं लगी। न ही उसनेकिसी से जानने कि कोशिश की कि यह आपरेशन किस चीज का होता है|

    उसने कागज कलम उठाई और लिखने बैठ गई| पञ लिखते समय उसके दिल कि धड़कन बढ़ गई थी| न जाने क्यों उसे लग रहा था कि वह उसके लिए सुयोग्य वर साबित होगा| वह स्वयं शिक्षिका थी - प्राईमरी स्कूल में और कालेजका लैक्चरार उसे अपने लिए अच्छा लगा| मन से भी वह किसी ऐसे वर की चाह करती थी| न उसे कोई व्यापारी पसन्द था, न ही उसके परिवार को| सभी पढ़े-लिखे थे और व्यापार करने वालों को अपने योग्य नही मानते थे| आखिर कई लोग है दुनियाँ में जो पैसे को प्राथमिकता नही देते| वीणा तो यही समझती थी कि पैसा स्वयं आ जाता है यदि व्यकित शिक्षित हो, सुलझा हुआ हो| नौकरी करने वालो की जीवन चर्या अधिक अच्छी होती है, व्यापार करने वालो की अपेक्षा| क्योंकि व्यापार में अच्छे-बुरे दिन सभी देखने को मिल सकतेहैं| नौकरी में बंधी-बंधाई आमदनी में जीने की कला स्वयं आ जाती है|

    पञ लिखकर वीणा ने एक बार फिर पढ़ा| सन्तुष्ट हो गई| एकाएक ना जाने क्या विचार आया मन में कि उठकर जल्दी से अपने पर्स में से अपनी एक फोटो निकाल लाई और उसे भी पञ के साथ लिफाफे में बन्द कर दिया| कुछ देर वह लिफाफे को देखती रही, फिर कुछ सोचकर मुस्कुराई और उस पर अपना पता लिख दिया|

    पहले वीणा पञ लिखने के बाद अपने पिता को दे दिया करती थी| वही लिफाफे में बन्द करके उसे डाक में डाल आया करते थे| लेकिन न जाने क्यों उसे आज किसी को भी कुछ भी बताने का मन नहीं हुआ| चुपचाप पञ बन्द करके उसने पर्स में डाल लिया| यही सोचकर कि अगले दिन स्कूल जाते समय वह स्वयं उसे डाक में डाल देगी| वैसे भी रविवार के दिन डाक तो निकलती नहीं|

    वीणा आज अपने मन को हल्का महसूस कर रही थी कई बार उसका मन हुआ कि वह रजनी को बता दे| निर्मला को बता दे| लेकिन वह चुप रही| कहीं कोई मीन-मेख निकालने लगा पहले की तरह तो? - ऐसे में वह अपना मूड़ खराब नही करना चाहती थी| आखिर शादी उसे अपनी पसन्द के पुरुष से करनी थी और यही उसे अपनी पसन्द का लग रहा था|

    आज डाक में एक बड़ा सा पैकेट आया देखकर अमित ने झपटकर उसे उठा लिया था| वह देव के वैवाहिक विग्यापन के सन्दर्भ में आए पञों का पैकेट था जो कि हिन्दुस्तान टाइम्स वालो ने भेजा था| पहले तो अमित का मन हुआ कि उसे वह वहीं खोल ले| लेकिन फिर उसे ठीक नहीं लगा| उसे लेकर वह रमेश के पास चला गया|

    रमेश उसके हाथ में पैकेट देखते ही बोला - "लाओ, लाओ इन्हीं की प्रतीक्षा थी|" और वह उठ कर बैठ् गया| देव तब यूनिवर्सिटी गया हुआ था| अमित पैकेट रमेश कुमार को थमा कर स्वयं वहीं बैठ् गया|

    एक-एक करके सभी पञ रमेश ने देखे| अमित भी सभी देखे जा रहा था| कुल लगभग पचास पञ थे| उसमें से केवल पाँच पञ अलग किए थे रमेश ने| अमित ने उनमें से एक पञ उठा लिया| उसमें फोटो भी था| लड़की देखने में अच्छी लग रही थी पञ एक बार दुबारा पढ़ा उसने| फिर अपनी राय जाहिर करने के लिए उसने मुँह खोला ही था कि रमेश ने कहना शुरु कर दिया, "लोगों को जरा भी अक्ल नही है| साफ-साफ लिखा था विग्यापन में आपरेशन के बारे में| कोई लिखता है - Sigmoid Clostomy क्या चीज होती है| कोई लिखता है कि क्या लड़के ने इस विषय मेंपी एच डी की है| कोई क्या लिखता है, कोई क्या।एक यही पञ है बस जिसमें उस लड़की का चिञ है - इसके पिता ने एक भी प्रश्न नहीं किया | - सुलझा हुआ लगता है ये व्यकित| जब आप एक बात खोल दे तो अधिक सवाल-जवाब करने से बेहतर है स्वयं ही जानकरी हासिल कर ली जाए|" रमेश को जैसे वह लड़की भी भा गई थी, ऐसा लग रहा था उसके शब्दों से, "वैसे भी ये व्यकित अच्छी पोस्ट से रिटायर हुआ है| सभी बच्चे पढ़े-लिखे हैं| कोई एम एस सी है कोई बी एस सी में पढ़ रहा है| स्वयं अच्छे सरकारी पद से रिटायर हुआ है| विग्यान कितनी तरक्की कर चुका है| ऐसी बाते तो अब आम चीज हैं|" तभी लगा देव आ गया है| रमेश ने उसे अपने कमरे में बुला लिया| देव भी समझ गया था पञ आए है तभी बुलाया है| आकर बैठ गया| रमेश ने उसे देखते हुए कहा - "पचास के करीब पञ है उनमें से मुझे केवल एक पञ ठीक लगा है| साथमें लड़की काफोटो भी है| तुम देख लो| वे लोग देहरादूनरहते है| लड़की एम ए बी एड है| टीचर है केन्द्रिय विद्यालय में| सारी फेमिली पढ़ी-लिखी है| सुन्दरभी है|" रमेश जैसे आश्वस्त हो चुका था|

    देव ने फोटो देखा| अच्छा था| पञ पर सरसरी निगाह डाली| बोला - "आपरेशन के बारे में कुछ नहीं पूछा?"

    "अरे भाई पढ़े-लिखे हैं| जो बात पहले कह दी विग्यापन में साफ लिखा है| वह उससे ही समझ गए हैं|" - रमेश कुमार ने अपने विचार प्रकट किए|

    "लेकिन हमें फिर भी खुलासा करना चाहिए|"

    देव ने अपनी इच्छा जाहिर की| लेकिन स्वर उसका भी दबा हुआ था| यानि उसको भी लड़की अच्छी लगी थी| अपने अनुकूल और रमेश को लगा वह चाहता है, यहीं बात बन जाए|

    "हाँ, सब खुलासा कर लूँगा मैं स्वयं| आज ही पञ लिख देता हूँ| साथ ही लिख दूँगा आपरेशन के विषय में कुछ और पूछना हो तो बताएँ|" - रमेश ने कहा|

    "बेहतर होगा यदि आप आपरेशन के विषय में विस्तार से लिखेंगे|" देव ने फिर कहा|

    रमेश तब थोड़ा और गम्भीर हो गया| उसने देव को समझाने के लहजे से कहा, "देखो देव! मैंने दुनियाँ देखी है| जितना हम किसी बात को तूल देंगे उतना ही दूसरों का शक बढ़ जाएगा| और यह शक बढ़े, ऐसा मैं नहीं चाहता| फिर भी तुम चाहते हो तो मैं लिख दूंगा| ऐसे नाजुक मामलो में दूसरों की मान लेनी चाहिए|"

    "सब ठीक है| आप लिख दें और जब देहरादून जाएँगे मैं स्वयं बता दूँगा|" देव ने अपन निर्णय सुनाया|

    "नहीं तुम कुछ नहीं कहोगे, ऐसा वायदा करो| सारी बात मैं स्वयं करुँगा| मैं बड़ा भाई हूँ तुम्हारा| यह मेरा फर्ज भी हैऔर मुझे कहने का ढ़ग भी आता है|" फिर कहा, "तुम्हें लड़की पसन्द है मैं अभी लिख रहा हूँ विस्तार से| विश्वास न हो तो पढ़ लेना| और वहाँ भी सब बात मैं करुँगा लेकिन स्वयं सारे स्थिति समझ कर|"

    मुझे पढ़ने की जरुरत नहीं| आपने कह दिया इतना ही काफी है| फिर उठने का उपक्रम करते हुए देव बोला, अब अपने कमरे में जाता हूँ| थोड़ा आराम कर लूँ|" - यह कहकर देव अपने कमरे की तरफ बढ़ गया|

    रमेश कुमार ने राहत की साँस ली| जैसे उसके मन से कोई बोझ उतर गया हो |

    देव के साथ-साथ अमित भी चला गया| तब रमेश कुमार ने पञ लिखना शुरु किया| देहरादून में पन्नालाल के नाम| उसकी लड़की वीणा के सम्बन्ध के लिए| देव के सम्बन्ध में विस्तर्त रुप से आपरेशन का लिखने लगे, फिर हाथ रोक लिया| साथ में मालती भी बैठी थी जो अभी तक चुपचाप स्वेटर बुनती हुई भाईयों का वार्तालाप सुन रही थी| रमेश ने उसकी ओर देखते हुए कुछ सोचना शुरु कर दिया|

    "क्या सोच रहे हो?" - मालती ने पूछा, जब उसने देखा कि रमेश उसी को देखते हुए कुछ सोच रहा है|

    "सोच रहा हूँ, लिखूँ कि नहीं?"

    "क्या लिखूँ कि नईं?" - मालती ने प्रश्न किया| तब रमेश कुमार ने कहा - "यही आपरेशन के बारे मेंदेव के|" फिर स्वयं राय भी दे दी| - "सोच रहा हूँ लिखने का कोई फायदा नहीं| इतना भर लिख देता हूँ कि लड़के के आपरेशन के बारे में और अधिक पूछना है तो बेझिझक पूछ सकते है|"

    "और जब वहाँ जाओगे तब?" मालती ने आगे की बात सोची |"

    तब का तब देख लूँगा| अभी जवाब तो आने दो|" - रमेश ने अभी आगे की बात टाल दी|

    "देख लो जैसी तुम्हारी मर्जी|" - मालती तटस्थ भाव लिए बोली, "यह तुम भाईयों का मामला है इसमेंमैं राय नहीं देना चाहती|"

    मर्जी तो उपर वाले की है कोशिश करना हमारा कर्तव्य है भाई|"

    और यह कहकर रमेश ने पञ वही स्माप्त कर दिया| लिफाफे में बन्दकरके उसने अमित को आवाज लगाई और पञ डाल आने केलिए दे दिया|

    जब अपने किसी के दर्द का प्रश्न हो तो मन सब कुछ छिपाना चाहता है| देव काआपरेशन आज कोई महत्व नहीं रख रहाथा किसी के लिए भी| वह बिल्कुल ठीक है| देव इतना अपना है, उसे उन्हें फिर से तो नहीं अपनाना| अपनाना है किसी दूसरे परिवार ने| दों परिवारों से निकलकर एक नए परिवार का जन्म होता है, शादी के बाद| यह परिवार कैसा होगा कल कुछ और हो गया तो इस नए परिवार का क्या होगा| इसकी किसी को चिन्ता नहीं| आज यह परिवार बस जाए| उससे आगे कोई नहीं सोचना चाहता|

    पञ का जवाब भी चन्द दिनों में आ गया| पन्नालाल ने उन्हें देहरादून आकर लड़की देखने का निमन्ञण दिया था| हाँ, यह बात अमित ने जरुर नोट कर ली थी कि पहले पञ की हस्तलिपि और इस पञ की हस्तलिपि में अन्तर था| तब उसने हँसते हुए कहा थारमेश को "लगता है पहला पञ लड़की ने स्वयं लिखा था अपने पिता की तरफ से और इस बार उसके पिता ने लिखा है स्वयं|" और वास्तविकता भी यही थी| लेकिन यह कोई असाधारण बात नहीं थी कि बहस छिड़ती| सबने आने वाले रविवार को देहरादून जाने का प्रोग्राम बना लिया| और इसी आशय की तार रमेश कुमार ने देहरादून भिजवा दी|

    खाना वीणा ने उन लोगों के साथ ही खाया| उसने कई बार महसूस किया कि देव रह-रह कर कनखियों से उसे देख रहा है| वह लजा-सी गई थी| कुछ अधिक नहीं बोल पाई थी| वैसे भी वह अपने काम से काम रखने वाली थी| घर में भी ज्यादा नहीं बोलती थी| सुनीता के साथउसके सम्बन्ध सखियों जैसे थे| बस, उसी से अपने मन की बात कहती थी| और सबसे निजी बाते नहीं करती थी| घरेलू लड़की थी और स्कूल से आने के बाद सदा माँ के कामों में हाथ बँटाती थी|

    घर का वातावरण भी एक सुशिक्षित मध्यम वर्गीय परिवार जैसा था| तड़क-भड़क में, उपरी दिखावे में कोई विश्वास नहीं रखता था| माता-पिता, भाई-बहन सभी शिक्षित थे, लेकिन सादगी से रहना सभी की विशेषता थी| माता-पिता ने शुरु से ही बच्चो को ऐसी सीख दी थी कि कभी किसी को झिड़कने की, समझाने की आवश्यकता नही पड़ी थी| मूक-अनुशासन में रहता हुआ परिवार आस-पड़ोस वालों के लिए सुखद उदाहरण था, इसीलिए आस-पड़ोस वालों की द्रष्टि हर समय उनकी गतिविधियों पर टिकी रह्ती थी|

    आज भी तो पड़ोस की थापा आँटी सुबह-सुबह ही बहाना बना कर उनके घर आ गई थी| तब निर्मला ने उन्हें बता दिया कि वीणा को देखने कुछ लोग दिल्ली सेआ रहे है और यह सुनकर मिसेज थापा वहीं रुक गई थी, सब थाह लेने को| इसीलिए आज रसोई में और किसी को जाने की आवश्यकता नहीं पड़ी| निर्मला और मिसेज थापा ने मिलकर सारा खाना बना लिया था| और ऐसे में खाने के समय भी मिसेज थापा घर के सदस्यों के बीच एक सदस्य सी बनी विराजमान थीं|

    देव को भी लगा कि घर के अभी बच्चे मिसेज थापा को कोई महत्व नही दे रहे है| हाँ, वह स्वयं खाना खाते समय निर्मला देवी को कुछ-कुछ कहती जा रही थी| और इसीलिए देव को लग रहा था कि खाने के बाद होने वाली बातों में भी मिसेज थापा ही पहल करेंगी|

    उसका अनुमान सही निकला| खानासमाप्त कर सभी बैठे हुए कोई बात करने की भूमिका बना रहे थे कि मिसेज थापा ने रमेश की ओर देखते हुए कहा, "अच्छा होता यदि कपूर साहब अपनी राय बता देते?"

    हाँ हाँ जरुर! यदि आपको लड़का पसन्द है तो हमें कोई भी ऐतराज नहीं है|"

    "क्यों बहन जी| क्या कहना है आपको|" मिसेज थापा ने सीधे सवाल किया निर्मला देवी से| जिनका उतर बिल्कुल सरल-सा मिला उन्हें, "वीणा से पूछ लती हूँ और लड़की-लड़के की राय जाननी ही ठीक है| हमें तो कोई ऐतराज नही|"

    - वीणा खाना खाकर दूसरे कमरे में जा चुकी थी और निर्मला देवी उसी के पास चली गई| पन्नालाल व सुनीता भी पीछे-पीछे चले गए थे| कुछ देर नही लगी उन्हें लौटने में| निर्मला देवी व सुनीता प्रसन्न थीं| यानि वीणा को देव पसन्द था और देव भी हाँ कर चुका था|

    तब मिसेज थापा ने फिर से कहा - "आप लोग दिल्ली से आए है|" अच्छा होगा यदि हम लोग अभी टीका कर लें लड़के को, ताकि बात पक्की हो जाए|"

    इस पर रमेश कुमार ने कहा - "जरुर-जरुर| हम लोगों का मुहँ मीठा करवा दीजिए, बस! यही काफी है| हमारे लिए यही टीका है|"

    उसकी यह बात सुनकर घर के सभी सदस्य प्रसन्न हो गए| तभी देव ने रमेश को आँखों हीआँखों में कुछ कहा| रमेश उसका मतलब समझकर बोला, "अच्छा रहेगा यदि हम लोग कुछ देर लड़का-लड़की दोनों को बात करने दें|" तब उठने का उपक्रम करते हुए उसने पन्नालाल से कहा, "आईए गुप्ता जी, हम लोग बाहर चलते है|"

    तब प्रमोद, रमेश, अमित उठ गए| पन्नालाल व प्रेम उनके साथ बाहर आ गए बरामदे में| रमेश धीरे से पन्नालाल को साथ लेकर एक कोने में खड़े होकर इधर-उधर की बातें करने लगा|

    पन्नालाल से रमेश की क्या बात हुई| देव को नहीं मालूम| उसे विश्वास था के वह उन्हें उसकी सारी स्थिति समझा देंगे| देव स्वयं वीणा से कुछ कहना चाहता था| लेकिन वह बात किस तरह से शुरु करे, उसे समझ नही आ रहा था| आखिर साहस करके उसने वीणा से कहा, आप को कुछ पूछना हो मेरे विषय में तो बेझिझक पूछ लीजिए|"

    वीणा ने पलभर सोचा फिर बोली, " आपके विषय में सब कुछ तो पता है और क्या पूछना|"

    देव इतना ही पूछकर आश्वस्तहो गया| इस विश्वास में उसनेकुछ और पूछना उचित नही समझा| यह एक आम कमजोरी है पुरुष की, अपनी कमी का खुलासा सरलता से नहीं कर पाता| सच को घुमा-फिरा कर कहना ही उसे अच्छा लगता है| और लड़की के मामले में यदि वह पसन्द हो तो हासिल करने में अपनी कमी छुपानी ही बेहतर समझता है|