• Chapter 6   Nayi Subah

  • अमित की उम्र पचीस के आसपास थी| कद देव की तरह लम्बा था| पूरा छः फुट| स्वास्थ्य की द्रष्टि से वह इकहरे बदन का था, लेकिन काम में अत्यधिक चुस्त| घर में सबसे छोटा था, लेकिन हर बात में सबसे आगे| और घर वाले उसे रखते भी सबसे आगे थे, क्योंकि वहीएक ऐसा था जो अपनी कमाई का हर पैसा बेझिझक अपने परिवार पर खर्च कर देता था| बड़े भाई उसके आफीसर थे, लेकिन अमित से अपनी जरुरते पूरी करवाते थे क्या रमेश, क्या देव, और क्या सबसे बड़े भाई कर्नल मोहन कुमार अमित काफी अच्छा कमा लेता था अपने व्यापार में| ठेकेदारी का धन्धा था उसका| इसीलिए अमित की घर भर में पूछ थी| और यही कारण था कि अमित आज भी देहरादून आया हुआ था |

    उसे इसी से खुशी हो जाती थी कि सभी उसका महत्व समझते है| पैसा तो हाथ का मैल है, किस्मत भी अच्छी है फिर खर्च करने की परवाह किसे| - शायद यही कारण था उसकी दरियादिली का और इसीलिए वह दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा था| उसकी तरक्की से सभी खुश थे क्योंकि सभी की जरुरतों का वह ध्यान रखता था|

    अमित बाहर ही खड़ा रहा प्रमोद के साथ जब सभी भीतर चले गए| प्रेम ने उन दोनो को भी कहा था भीतर आने को लेकिन वे अपनी बातो मेंइतने तल्लीन थे कि भीतर जाना भी भूल गए|

    प्रमोद देव का अभिन्न मिञ था| वह भी लैक्चरार था यूनिवर्सिटी में| दोनो ने एक साथ पी एच डी की थी| उनकी दोस्ती की जड़ इतनी मजूबूत थी कि सभी को उनसे ईर्ष्या होती थी| देव व प्रमोद एक दूसरे के पूरक थे| और अलग-अलग रहते हुए भी यूनिवर्सिटी में कभी उन्हें किसी ने अकेले घूमते नहीं देखा| जब देखा, साथ-साथ| रात देर से ही दोनो बिछुड़ते थे| प्रमोद जबकि विवाहित था| लेकिन उसका विवाहित जीवन भी रात दस बजे के बाद शुरु होता थाऔर सुबह दस बजे तक चलता था। इस बीच प्रमोद घर रहता था।| शेष समय यूनिवर्सिटी में देव के साथ - पढ़ना, रिसर्च व घूमना सब एक साथ| हाँ छुट्टी के दिन उन दोनो के साथ कोमल होती थी| कोमल यानि प्रमोद की पत्नी आज लेकिन वह नही आ सकी थी उनके साथ| एक तरह से मालती उसे लाना नही चाहती थी क्योंकि कोमल उसकी ईर्ष्या का पाञ थी| देव की चहेतीभाभी का दर्जा मालती भाभी की बजाय कोमल को जो मिला हुआ था|

    "सो, अमित! डाक्टर साहब आज बंध गए|" प्रमोद ने अमित के कन्धे पर अपने हाथ टिकाते हुए कहा| वह देव को हमेशा "डाक्टरसाहब" कहता था|

    "हाँ, और अब शादी भी जल्दी होनी चाहिए|" अमित भी खुश था| खुश इसीलिए कि उसने एक अर्से बाद देव को खुश देखा था| देव फालतू बोलता भी कहा था| घर भर में थोड़ी रमेश कुमार के साथ बात करता था, वह भी जब वह छुट्टी आता था और थोड़ी बहुत बात-चीत अमित के साथ करता था| शेष समय घर में भी अपनी किताबो में तल्लीन रहता था| अमित के साथ वह थोड़ा घनिष्ट हुआ था अपनी बिमारी के दौरान| तब देव ने पाया कि अमित ने उसके कष्ट के पलो को उसके साथ सहा है| देव महीना भर अस्पताल रहा, तब भी अमित रात दिन उसके साथ रहा| उससे पहले भी देव जहाँ-जहाँ जाता था अमित साये के तरह साथ जाता था| बीमारी के बाद यूनिवर्सिटी तक भी अमित देव को छोड़ने जाता रहा| इसी कारण देव अमित को प्रमोद के बराबर पाता था |

    अमित अभी प्रमोद से कुछ कहने ही जा रहा था कि उसकी निगाहें बाहर गेट की तरफ उठ गई| सामने से एक लड़की आ रही थी| अमित उस लड़की को एक टक देखता रह गया |

    आह! कितनी सुन्दर है यह लड़की| अमित ने उसे अपनी आखों में उतारा| प्रमोद की उपस्थिति में उसने उस लड़की से नजरें चुरा ली| लेकिन तब तक प्रमोद भी उस लड़की को देख चुका था|

    "अमित कुमार जी| कहाँ खो गए हैं| उसने अमित की मनःस्थिति भी भाँप ली थी|" लेकिन अमित ने एकदम नकारात्मक स्वर से कहा धीरे से - कहीं भी नहीं - किसी को देखना गुनाह तो नहीं|"

    "हर किसी कोदेखने का अन्दाज अलग होता है|"

    - प्रमोद ने फिर हल्के लहजे से कहा|

    वह लड़की तब तक भीतर जा चुकी थी|

    "चलो, हम भी अन्दर चलते है|" प्रमोद ने कहा और भीतर जाने को हुआ|

    "अभी रुक जाओ|" अमित के मन में चोर था जिसको प्रकट कर ही बैठा वह|

    "क्यो? कहीं वह लड़की यह न समझ ले कि तुम उसके पीछे-पीछे भीतर आए हो|" प्रमोद ने उसके मन की बात कह दी| फिर बोला - "पागल! देख लो, जान लो किसकी सहेली है| अच्छी लगी तो काम बड़ी असानी से बन जाएगा|"

    और प्रमोदके साथ अमित को भी अन्दर जाना पड़ा| तब तक उस लड़की का देव से परिचय हो चुका था और वह देव के पास बैठी थी| उन दोनो के भीतर जाते ही देव ने उनको उस लड़की का परिचय दिया कि वह वीणा की छोटी बहन है प्रेम से छोटी और गीता से बड़ी प्रिया |

    'प्रिया! प्रिया! अमित केदिल ने आवाज लगाई|

    उसकी प्रिया! उसने प्रिया की तरफ पलभर के लिए देखा - वह तब हँस रही थी खिलखिलाकर गीता की कोई बात सुनकर| अमित ने उसी खिलखिलाहट को मन में बिठा लिया |

    देव वहाँ से बंध कर जा रहा था और अमित किसी को मन में बिठा कर| कविता की पक्तियाँबनाकरगुनगुना रहा था अमित|

    "बिना बात किए, मुलाकात किए

    पल्कों में कौन बस जाताहै

    आँखों में सपने बन कर

    कौन रात-रात मुस्काता है|"

    घर भर में हर कोई खुश था वीणा की शादी पक्की हो जाने की खबर सुनकर| एक महीने में ही सब कुछ होने जा रहा था अभी आठ दिन पहले तो बात पक्की हुई थी और आज तारीख भी निकाल ली थी| बीस दिन बाद वीणा की शादी थी| लड़के वाले तो चाहते थे और भी जल्दी हो जाए लेकिन पन्नालाल के लिए यह इतना सरल नहीं लग रहा था| उन्हें लग रहा था कि ढ़ेर-सी तैयारियाँ करनी है वह सब बीस दिन में कैसे पूरी कर सकेंगे| लड़के वालों ने उन्हें विश्वास दिलाया था कि उन्हें किसी चीज की आवश्यकता नहीं है| वे सिर्फ लड़की चाहते हैं - सिर्फ अपने लड़के की दुल्हन| - न बैंड-बाजा, न बारात, बस सादगी से विवाह|

    लेकिन निर्मला ने इस पर एतराज किया था| सुनीता की शादी तो उन्हें बिलासपुर जाकर करनी पड़ी थी, इसलिए उनके कई शौक पूरे हुए बिना रह गए थे| वीणा की शादी में वह पूरा धूम-धड़ाका देखने की लालसा लिए थी| उन्हें बुरी नही लगी यह बात कि लड़के वाले बारात लेकर नही आएगें| उन्हें केवल यहीं अखरा कि चाहे वह घर के लोग ही आएँ लेकिन बैंड-बाजा जरुर साथ हो, बारात जरुर सजे, इतनी ही सादगी से हो यह विवाह!

    हाँ, वीणा की शादी होनी थी इस घर में| नए घर की पहली शादी| यह घर पन्नालाल ने लिया था अपने रिटायर होने के बाद| जब यह तय हो गया था कि वे सब परिवार सहित देहरादून ही सैटल होंगे| शुरु से ही बच्चो की शिक्षा यही हुई थी| नौकरी के दौरान उन्हें दूर-दूर रहना पड़ा अपने परिवार से लेकिन निर्मला बच्चो के प्रति माँ-बाप दोनो का कर्तव्य यहाँ रहकर निभाती रही| ढ़ेर-सी कठिनाईयाँ आई उनकी राह में, लेकिन सब का सामना करने का साहस वह जुटाती रहीं| बंधी हुई आय में अपने परिवार का खर्च चलाया बड़े सुचारु रुप से निर्मलाने|

    उसकी साध थी उसके सब बच्चे शिक्षा ग्रहण करें उसी के लिए उसने अपने सब शौक अपने से दूर रखे|

    बचपन में बहुत शौक थे निर्मला के| घर भर की इकलौती लड़की| पिता की ढ़ेर सारी जमीन जायदाद| किसी चीज की घर में कमी नही थी| दिन-भर इधर से उधर घूमती रहती| जो फरमाईश करती कभी माँ, कभी पिता, कभी बड़े भाई पूरी करने को आतुर रहते| शक्ल से जितनी सुन्दर थी, अक्ल भी उतनी अच्छी पाई थी| उसने पढ़ने में भी बड़ी तेज थी| लेकिन यह सब का सब बदल गया एकदम| पिता नही रहे| चल बसे एकाएक बिमारी में| घर की आमदनी रुक गई| जो थोडीबहुत आय थी उसमें माँ ने अपना पेट काटकर बच्चो को पढ़ाना जारी रखा| लेकिन बलि का बकरा बनी निर्मला| बच्चोमें लडकोंकी पढ़ाई ज्यादा जरुरी समझकर, उसकी पढ़ाई रोक दी गई छठी कक्षा के बाद| बहुत रोई थी निर्मला| उसके शिक्षक भी घर पर चलकर आये थे| यही कहनेकि उसे कस्बे में जाने दिया जाए, वे उसकी फीस माफ करवा देंगे| लेकिन माँ नही बता सकी उन्हें कि फीस के अलावा भी बाकी खर्चे है जो चार-चार बच्चो के लिए पूरे करना उनके बस की बात नहीं| निर्मला की पढ़ाई छूट गई और वह घर पर रहकर अपनी माँ के कामो में हाथ बटाने लगी| मांने घर रहते उसे सिलाई-कढ़ाई सब सिखा दी| अभी एक ही वर्ष और बीता था कि माँ बीमार पड़ गई| उसके बचने की उम्मीद भी न रही| माँ को लगा वह अब न बचेगी| ऐसे में उसे निर्मला की चिन्ता सताने लगी| बीमारी के साथ-साथ यही सोचकर घुलती रहती थी कि उसके बाद निर्मला का क्या होगा| लड़के तो अपने को स्वय संभाल लेंगे लेकिन उसे कौन संभालेगा|

    और ऐसे में माँ को एक ही रास्ता सुझाई दिया - निर्मला का विवाह| अभी वह पन्द्रह साल की थी, लेकिन समय के लिहाज से यह उम्र विवाह योग्य ही थी| और ऐसे में पन्नालाल का रिश्ता आया| वह विधुर था| उम्र में निर्मला से पन्द्रहवर्ष बड़ा| लेकिन माँ ने ऐसा कुछ नही सोचा| अपनी बेटी के योग्य वर माना उसे, वह वक्त नही गवाना चाहती थी और न ही और अच्छा परिवार उसके सामर्थ्य में था - बस झटपट शादी रचा दी उसने निर्मला की|

    पहले-पहल तो निर्मला को बहुत अटपटा लगा था, लेकिन जल्द ही उसके किशोरामन ने एक प्रौढ का रुप धारण कर लिया था। पन्नालाल भी उसका बहुत ध्यान रखता था। समय के साथ-साथ उसकी सन्तानेंहुईं।तब निर्मला को लगा कि वह अपने बचपन के सपने इन सन्तानों के माध्यम से पूरा करेगी| उसकी माँ उसे नही पढ़ा सकी लेकिन वह अपनी लड़कियोकोखूब पढ़ाएगी| वह जो करना चाहेगी, उसके लिए हर साधन जुटाएगी| चाहे उसे भूखा क्यों न रहना पड़े|

    इसीलिए पन्नालाल की तनख्वाह का मुख्य भाग तो बच्चो की पढ़ाई में और दूसरी जरुरते पूरी करने में चला जाता था| लेकिन निर्मला के संयम और आत्मविश्वास का उसके बच्चो पर भी असर पड़ा| किसी पर भी समय के बदलते स्वरुप का असर नहीं पड़ा| सभी को अपनी सीमित आर्थिक दशा का ग्यान था और किसी ने माँ को किसी बात के लिए परेशान नही किया|

    ऐसे में जब पन्नालाल रिटायर होने को आए तब तक केवल सुनीता का ही विवाह हो सका था| हाँ वीणा और रजनी अपनी पढ़ाई पूरी करके केन्द्रिय विद्यालय में अध्यापिकाए लग चुकी थी| और तब पन्नालाल ने निर्मला के जोर देने पर अपनी बच्चियो की शादी की चिन्ता के बदले रिटायरमेन्ट पर मिली ग्रेच्युटी की रकम से देहरादून में अपने लिए एक अच्छा सा मकान ले लिया।

    निर्मला का एक वर्षो से सजोया स्वप्न पूरा हो गया| बच्चो को भी अपने नए घर में जाने की खुशी थी| पन्नालाल रिटायर होने के बाद घर नही बैठा| उसने एक लोकल फर्म में नौकरी कर ली थी| घर की जरुरतें पहले से ही सीमित थी और उसकी तनख्वाह से घर का खर्च चल रहा था|

    वीणा व रजनी दोनों की तनख्वाह बैंक में जाती थी| हाँ दोनों बहने अपनी छोटी बहनों की सभीजरुरतो का ध्यान रखती थी| प्रेम इस बीच बी एस सी पूरी करके फौज में भर्ती हो गया था| अभी लेफ्टिनेंट था जो कुछ भी बचता था वह माँ को सौप देता था| ऐसे में वीणा की शादी कि अधिक चिन्ता नही थी निर्मला को| उसने अपने लिए अच्छी रकम जोड़ ली थी और साथ में लड़का भी ऐसा था जिसकी कोई माँग नही थी|

    शादी सादगी से होनी थी, लेकिन निर्मला अपने पहचान वाले सभी लोगों को आमन्ञित करना चाहती थी| घर में एक तड़क-भड़क का उत्सव मनाना चाहती थी| इसीलिए उसने लड़के वालो को कहा था बैंड-बाजे के साथ आने को|