• Chapter 7   Nayi Subah

  • पन्नालाल के लिए दिल्ली नई जगह नहीं थी| नौकरी के दौरान भी कई बार दिल्ली आ चुका था और नौकरी के बाद भी| पिछली बार वह वर्ष पहले ही आया था - प्रिया के साथ| प्रिया को प्री-मैडीकल की परीक्षा देनी थी| और दिल्ली जैसी जगह में वह राजेन्द्र नगर में अपने किसी पुराने मिञ के घर ठहरा था और वहीं से अगले दिन वह प्रिया के साथ मौलाना आजाद मैडीकल कालेज तक गया था| दिल्ली का यहीं इलाका देखा हुआ था उसका|

    माडल-टाउन की ओर जाने का यह पन्नालाल का पहला अवसर था| साथ में निर्मला थी| रमेश ने उसे अच्छी तरह समझा दिया था कि बाहर निकलते ही उसे सीधीबस मिल जाएगी| व्यर्थ में वह किसी स्कूटर-टैक्सी के चक्कर में न पड़ जाएँ| और पन्नालाल ने भी यही किया| बस अड्डे से निकलकर उन्होंने मुदिका बस पकड़ ली| बस में अच्छी खासी भीड़ थी और वे दोनों धीरे-धीरे खिसकते हुए आगे ड्राईवर -सीट के पास आकर खड़े हो गए| पीछे की सीटों पर बैठे किसी भी याञी ने उनकी उम्र का ख्याल करके उन्हें सीट नहीं दी| सबसे आगे की सीट पर एक नवयुवती बैठी थी| वहीं उन्हें देखकर खड़ी हो गई| तब पन्नालाल ने निर्मला को वहाँ बैठ जाने को कहा| क्रतग्यता से उसे देखते हुए निर्मला सीट पर बैठ गई| वह काफी थकी हुई थी उसी लड़की की ओर देखते हुए वह बोली, "आओ बेठी! तुम भी बैठ जाओ, मेरे साथ|"

    "नहीं-नहीं आप बैठे रहिए| मुझे बस थोड़ी दूर तक जाना है|" - उस नवयुवती ने निर्मला से कहा|

    " कहाँ तक जाना है, बेटी? क्या माडल टाउन तुम्हारे रास्ते में आएगा?"

    "मुझे माडल-टाउन ही जाना है|" उस लड़की ने कहा| तब पन्नालाल और निर्मला खुश हो गए|

    "चलो तब तो अच्छा है, बेटी, हमें भी वहीं जाना है| अल्पना सिनेमा के पास|"

    "मैं आपको बता दूँगी|" फिर कुछ रुककर बोली - "आप कहाँ से आ रहे हैं?"

    "देहरादूनसे|"

    "शायद पहली बार आए है?"

    "हाँ, यही समझो|"

    इसके बाद उन लोगो में और बात नहीं हुई| माडल टाउन आया तो उस लड़की ने उन्हें भी उतर जाने को कहा|

    सामान के नाम पर पन्नालाल के पास एक बैग था| जिसे हाथ में लिए वह और निर्मला उस लड़की के पीछे-पीछे बस से उतर गए| तब उस लड़की ने उनसे घर का नम्बर पूछाऔर उन्हें घर तक पहुँचा दिया|

    घर पर सभी को उनकी ही प्रतीक्षा थी| पन्नालाल व निर्मला ने जैसे ही घर में प्रवेश किया सामने उन्हें रमेश कुमार खड़ा दिखा| उनकी आहट पर ही वह बाहर आ गया था|

    "नमस्कार जी|" हाथ जोड़ते हुए बोला, "स्वागत है आपका| आईए|" और आगे बढ़कर उसने पन्नालाल से हाथ मिलाया|

    तब तक भीतर से रमेश कुमार के व्रद्ध पिता व माँ भी आ गए थे| सभी का आपस में अभिवादन हुआ और उन्हीं के साथ ड्राईग रुम में आ गए| पल भर में घर के सभी लोग वहाँ आ चुके थे| अमित व देवभी| कर्नल मोहन कुमार दिल्ली में नहीं थे| न ही उनकी पत्नी|

    मालती ने प्रवेश किया ट्रे लिए, उसमें शरबत के गिलास थे| उन दोनों को नमस्कार के साथ उसने कहा, घर में सभी ठीक होंगे? वीणा कैसी है?"

    "सब कुशल-मंगल हैं" पन्नालाल ने कहा |

    "आप आराम करेंगेथोड़ा?" - देव ने पिताश्री राम ने उनसे कहा|

    "नहीं-नहीं, आराम की आवश्यकता नहीं महसूस हो रही| इतना सफर करने की तो आदत हैहमारी|" - नर्म स्वर में कहा पन्नालाल ने|

    "पाँच-छः घंटे तो लगे होंगे?" - फिर पूछा श्री राम ने |

    "पूरे छः घंटे लग गए| सुबह छः बजे की बस पकड़ी थी हम लोगों ने|"

    "हमें तो उस तरफ जाने का अवसर ही नहीं मिला कभी|" - तब माँ क्रष्णा ने कहा|

    "- अब तो सम्बन्ध बन गए हैं| आना-जाना लगा ही रहेगा|" - कहा निर्मला ने|

    "भगवान सुख करे|" - यह अक्सर कहती थी क्रष्णा| शायद भगवान पर अधिक विश्वास था उसे|

    "ईश्वर तो जो करता है अच्छा ही करता है, बहन जी| शेषव्यकित को अपने कर्मो पर विश्वास होना चाहिए|" - पन्नालाल जो नियम से ईश्वर की आराधना करता था| अपने ईश्वर प्रेम से परिचय करवाया उसने|

    रमेश कुमार व देव महसूस कर रहे थे कि बात बुजुर्गोकी चल रही है| जो बिना छोर के आगे बढ़ती रहेगी| तब रमेश कुमार ने बातचीत का विषय बदलते हुए कहा - ईश्वर ने ही संजोग बनाया था देव और वीणा का तभी देखिए आप कहाँ थे और हम कहाँ| आज हम लोगो के बीच एक अटूट रिश्ता कायम हो चुका है| - और फिर बोला - "बाबूजी ने पूछ लिया है पण्डित से| उसने नौ फरवरी के तारिख निकाली है| आप बताइए आपके पण्डित ने कोई और शुभ महूर्त बताया है?"

    "आपने पूछ लिया वहीं काफी है|" - पन्नालाल ने कहा |" तब ठीक है, नौ फरवरी को हम लोग शाम तक पहुँच जाएँगे| रात फेरे दिलवाकर दस की सुबह वापिस आ जाएँगे|"

    तब निर्मला ने कहा क्रष्णा से, "बहन जी, आपके रीति-रिवाजो का हमें कुछ अधिक नहीं पता| थोड़ा कुछ बता दीजिए|"

    अभी क्रष्णा कुछ कहती कि देव बोल उठा, "कोई रीति-रिवाज नहीं हैं| बस हम पाँच लोग आएँगे शान्ति से और हमें कुछ चाहिए भी नही|"

    "शान्ति से नहीं बेटा| देहरादून में जब सेहमने घर बनाया है यह हमारे घर की पहली शादी है| सुनीता की शादी हमने हिमाचल में ही की थी| सारीरिश्तेदारी जो वहाँ है| अब वीणा की शादी कैसे चुप्पी से हो जाए| यह ठीक नहीं लगता| आप घर के लोग ही आएँ कोई बात नहीं| वैसे अच्छा लगता कि बारात आती| फिर भी मेरी प्रार्थना है बैंड-बाजा आए|"

    "चलिए आपकी बात रहेगी| शेष हमें कुछ नहीं चाहिए|" रमेश कुमार ने निर्णयात्मक स्वर में कह दिया|

    "और हमारी कोई माँग नहीं है| आपने जो देना है अपनी बेटी को देना है|" - क्रष्णा ने कहा "वैसे हमारे में सब भाई-बहन के कपड़े होते है| सभी रिश्तेदारो ..." अभी क्रष्णा इससे आगे कुछ कहती कि देव ने तनिक आवेश में कहा - "कुछ नईं होता हमारे में| न भाई-बहन का, न मेरा, न ही किसी रिश्तेदार का|" - फिर माँ के आमुख होकर बोला - "मम्मी! आपसमझती क्यों नहीं मुझे| मुझे कोई भी लेन-देन, दिखावा पसन्द नहीं है|"

    देव की बात सुनकर पन्नालाल व निर्मला को महसूस हुआ कि देव के शब्दों में कठोरता थी| - अडिग थे शब्द उसके जिन्हें कोई न बदल सका| और माँ अब खिसिया-सी गई, बोली, "मेरा ऐसा तो मतलब न था| बहन जी ने पूछा मैने कहा|"

    "ऐसा कहना और जताना एक ही बात है| माँ! इन बातो को रिश्तो के बीच न लाइए|" देव ने कुछ इस तरह कहा कि जैसे इशारा किया हो उसने इस बात को यहीं समाप्त करने का|

    तब रमेश कुमार ने समझदारी दिखाई और मालती को कहा - "भई, खाने की तैयारी करो|"

    "नहीं-नहीं, रमेश जी, हम खाना नहीं खाएँगे|"

    "खाना क्यो नही खाएंगे|" आप तो इन पुरानी विचारधाराओ को न अपनाइए|"

    नहीं ऐसी बात नहीं|"

    "तो फिर सन्कोच काहे का| अब यदि आपका घर हमारा है तो हमारा घर भी आप ही का है| इस रिश्ते में संकोच नहीं होना चाहिए|"

    खाने के पश्चातपन्नालाल व निर्मला देहरादूनलौटना चाहते थे| लेकिन सभी ने आग्रहपूर्वक रोक लिया| निर्मला को भी चाह थी कि दिल्ली आई है तो बच्चो के लिए कुछ लेती जाए| उसके मन की बात जैसे अमित ने पढ़ ली हो| शाम की चाय के दौरान उसी ने कहा था, "आँटी आप बोर हो रही है, मन है तो चलिए आपको बाजार तक घुमा लाउं|

    निर्मला ने देखा उसकी और| खुश हुई| अच्छा लड़का है, उसके मन की बात समझ गया है| वैसे वह संकोची स्वभाव कि थी| तभी तो क्रष्णा से अधिक बात न कर सकी थी अभी तक| घर से बाहर आकर उसे बातें करने की उपेक्षा बातें सुनने में मजा आता था| जब भी घर से बाहर जाती थी ढ़ेर-सी बातें सुनकर ही आती थी और घर लौटकर सभी बच्चो को एक कहानी कि तरह पिरों कर वही बातें सुनाती थी| तभी सभी बच्चे माँ की प्रतीक्षा में आँखें बिछाए बैठे रहते थे| माँ के बिना घर सभी को सूना लगता था|

    "जाना तो चाहती हूँ बेटा, यदि तुम्हें तकलीफ न हो|" - कुछ संकोच भरे लहजे में कहा निर्मला ने|

    तो फिर उठिए, तैयार हो जाईए| अभी चलते हैं|" अमित को जैसे मुहँ मांगी मुराद मिल गई| लेकिन क्रष्णा को यह सब अच्छा नही लगा| शायद वह चाहती थी कि निर्मला के साथ वह बाजार जाए| लेकिन ऐसा कुछ नहीं कहना चाहती थी कि जिससे देव नाराज हो जाए| देव का स्वभाव ही कुछऐसा था कि शुरु से ही घर में उससे या उसके सामने कोई भी अधिक नहीं बोलता था| ऐसे में क्रष्णा को मन-मसोस कर रहना पड़ा|

    अमित कुछ ही देर में तैयार होकर अपनी मोटर साइकिल पर निर्मला को बैठा कर कमला-नगर की तरफ चल दिया| वह निर्मला पर अपना अच्छा प्रभाव डालना चाह रहा था| उसकी हार्दिक इच्छा थी कि निर्मला उससे उसके बारे में कुछ पूछे उसके व्यापार के बारे में पूछे| ताकि वह उसे प्रभावित कर सके| लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ निर्मला बाजार में घूमती हुई उसे बताती रही - कि वह क्या कुछ लेना चाह रही है| अमित उसकी जरुरत के अनुसार किसी न किसी दुकान पर उसे लेकर जा रहा था| निर्मला ने प्रिया के लिए एक स्वेटर, रजनी के लिए एक शाल, गीता के लिए एक जोड़े सैंडल और प्रेम के लिए एक सिल्क की कमीज खरीदी| अमित ने उसे प्रिया की स्वेटर चुनने में अधिक रुची दिखाई, निर्मला नेभी ऐसा महसूस किया|
    प्रमोद को भी देव ने अपने पास बिठा लिया था| लेकिन प्रमोद से बैठा नही गया| वह देव की गोद में सिर रखकर लेट गया|

    "आज फिट हो गया है, प्रमोद|" देव ने कहा और रमेश कुमार की ओर देखने लगा|

    "आज खुश है बहुत|" रमेश कुमार ने प्रमोद की ओर देखते हुए कहा| उसे लग रहा था प्रमोद मदहोश है जैसे| लेकिन रमेश की बात सुनते ही उसने अपना सिर उठाकर कहा ः "खुश क्यों न होउँ! मेरे यार की शादी पक्की हो गई है| मेरे लिए ये सबसे अच्छी खबर है ....|"
    फिर कुछ रुककर बोला- "अब तो रोज जशन चलेगा| कल मैं पार्टी दूँगा....|" और फिर प्रमोद ने देव के गालों को चूम लिया|
    वह बहुत खुश था|